सोशल मीडिया और साहित्य पर मंथन

सोशल मीडिया और साहित्य पर मंथन

पश्चिम बंग हिंदी अकादमी की ओर से दीनबंधु मंच के रामकिंकर हॉल में एक विशेष संगोष्ठी आयोजित 'सोशल मीडिया में साहित्य : साहित्य में सोशल मीडिया' विषय पर विद्वज्जनों ने व्यक्त किए विचार
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सिलीगुड़ी : मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अनुप्रेरणा एवं पश्चिम बंग हिंदी अकादमी के अध्यक्ष विवेक गुप्त की सृजनात्मक पहल के तहत अकादमी द्वारा बीते शुक्रवार की शाम दीनबंधु मंच के रामकिंकर हॉल में एक विशेष संगोष्ठी आयोजित की गई।

इसका विषय 'सोशल मीडिया में साहित्य : साहित्य में सोशल मीडिया' था। संगोष्ठी में स्वागत वक्तव्य रखते हुए सिलीगुड़ी महकमा सूचना व संस्कृति अधिकारी अनिर्वाण दाम ने सोशल मीडिया के महत्व और साहित्यकारों की जवाबदेही के बीच अनिवार्य संतुलन की बात रखी तो अकादमी के प्रशासनिक हलके में भी सोशल मीडिया में साहित्यिक प्रस्तुतियों के स्वरूप को संजीदगी से लेने की आवश्यकता पर बल दिया।

अकादमी के सदस्य दिलीप दूगड़ ने संगोष्ठी का स्वागत करते हुए कहा कि, सोशल मीडिया जिस तरह से विकृति का एक स्रोत है उसमें उत्कृष्ट रचनाओं से युवा मन का संस्कार किया जा सकता है अन्यथा हमारे बौद्धिक साहित्यिक प्रयास सार्थक नहीं हो पाएंगे। विषय प्रवर्तन करते हुए अकादमी सदस्य डॉ. अजय कुमार साव ने कहा कि, साहित्यकार सोशल मीडिया के जिम्मेदार नागरिक हैं। यहां प्रकाशित होने की सुविधा है तो साथ ही स्वयं के प्रकाशन के प्रति पाठकों और अन्य साहित्यकार मित्रों की प्रतिक्रिया के निरंतर सृजनात्मक नहीं हो पाने पर आश्चर्य मिश्रित निराशा को देखना पड़ता है। यह चुनौती है कि सोशल मीडिया में वह कैसी रचनाओं को प्रकाशित करें। इसके लिए जरूरी है कि पाठकों में उन्हें 'लक्षित पाठक' के अनुसार उनकी समस्याओं को विषय बनाएं। साहित्य से बढ़ती दूरी कम करने को सोशल मीडिया एक जरूरी माध्यम है, तो साथ ही साहित्य के विषयों को आज के 'जूमर्स' के हित में समृद्ध बनाने की भी जरूरत है।

मुख्य वक्ता अकादमी के सदस्य डॉ. संजय जयसवाल ने कहा कि, सोशल मीडिया में साहित्यिक रचनाओं को साझा करने से पहले उसकी कथ्यगत संरचना को साहित्यकार अपने अनुभव से समृद्ध बनाए। कुछ भी देखा और सुना यदि साहित्य के रूप में सोशल मीडिया में प्रस्तुत किया जाएगा तो वह निरर्थक ही नहीं अनर्थकारी भी साबित होगा। विशिष्ट वक्ता डॉ. रहीम मियां ने कहा कि, आज जिस प्रकार सोशल मीडिया में हर कोई कुछ भी लिखकर कवि बनता फिर रहा है, वास्तव में उन्हें न तो कविता की पहचान है, न तत्वों की पहचान। केवल लाइक व कमेंट के द्वारा हम न तो लेखक को माप सकते हैं और न ही उनकी रचना को। हिंदी में अभी तक फेसबुक कविता आंदोलन की शुरूआत भी नहीं हुई है जबकि यह आंदोलन नेपाली और बंगला साहित्य में चल रहा है।

अकादमी के सदस्य डॉ. ओम प्रकाश पांडेय ने फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर साहित्यिक सृजन और उसके साझा करने के लिए विधागत मर्म को पहचानने की आवश्यकता को रेखांकित किया। डॉ. मुन्नालाल प्रसाद ने कहा कि, सोशल मीडिया में लाइक्स, शेयर और टिप्पणियां साहित्यिक गुणवत्ता के मानदंड नहीं हो सकते। 'खबर समय' के संस्थापक संजय शर्मा ने सोशल मीडिया को साहित्यिक अभिव्यक्तियों की पाठशाला के रूप में बताया, जहां अन्य साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों की गंभीर टिप्पणियों से एक सार्थक साहित्यिक परिवेश बन सकता है।

अकादमी के सदस्य मनोज यादव ने युवा समाज के समक्ष सोशल मीडिया में साझा की गई साहित्यिक गतिविधियों के महत्व को रूपायित किया। नक्सलबाड़ी कॉलेज की प्राचार्या डॉ. सविता मिश्रा ने 'प्रतिलिपि' जैसे साहित्यिक प्लेटफाॅर्म से युवा समाज को जोड़ने की सलाह दी। साहित्यकार देवेंद्र नाथ शुक्ल ने साहित्य की सृजनात्मक शक्ति के महत्व को उद्घाटित किया। मारवाड़ी युवा मंच के अध्यक्ष प्रणय गोयल ने कहा कि, सोशल मीडिया पर सुविधा है, रचनाएं अच्छी लगें तो पढ़ें वरना आगे बढ़ें।

इस अवसर पर देवकोटा संघ के अध्यक्ष मिलन रुचाल, कवि डॉ. श्याम सुंदर अग्रवाल, कवयित्री किरण अग्रवाल, रूबी प्रसाद, प्रेरणा गुप्ता, ममता मालपानी, प्रियंका जयसवाल, अंजू गुप्ता, कवि सुनम प्रसाद, पत्रकार पराग विश्वास, आदि ने भी अपनी वैचारिक सहभागिता से इस मुद्दे को विशेष बनाया कि साहित्यकार सोशल मीडिया में लेखकीय सरोकार को संजीदगी से लें। संगोष्ठी का कुशल संचालन पूर्व शिक्षिका एवं साहित्यकार इंद्रजीत कौर ने किया।

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