सिलीगुड़ी : जैसे पत्थर को तराशकर मूर्ति बनाई जाती है, ठीक उसी प्रकार माता-पिता की डांट-फटकार, हथौड़े और छैनी की तरह ही होती है, जो शुरुआत में दर्द देती है, लेकिन अंततः बच्चे को एक बेहतर, मजबूत और सुंदर इंसान बनाती है। लेकिन इस आधुनिक और इंटरनेट के युग में डांट-फटकार बच्चें बर्दाश्त नहीं कर पाते है । वर्तमान समय में बच्चें कम उम्र में ही डिप्रेशन और ओवरथिंकिंग के शिकार हो रहे है। कई स्कूलों में काउंसलर तो हैं जो छात्रों को शैक्षणिक, करियर, और सामाजिक-भावनात्मक सहायता प्रदान करते हैं लेकिन फिर भी बच्चे दिशाहीन हो रहे हैं । डिप्रेशन और ओवरथिंकिंग की चपेट में आ रहे है इस पीढ़ी को कैसे बचाया जा सकता है, इस पर साइकोलॉजिस्ट, अधिवक्ता, और शिक्षक ने कुछ टिप्स दिए हैं।
साइकोलॉजिस्ट ने यह कहा
लगभग 10 वर्षों का अनुभव रखने वाली साइकोलॉजिस्ट श्रिया सिंघल अग्रवाल ने बताया, बढ़ती उम्र के बच्चों में डिप्रेशन और ओवरथिंकिंग का होना देखा जाए तो , यौवन समय से पहले आना और इसे शरीर व मानसिक तौर पर होने वाले बदलाव, वहीं दूसरी ओर कोरोना काल के बाद मोबाइल का इस्तेमाल हद से ज्यादा होना, जिसमें एजुकेशन के अलावा बहुत सी गलत जानकारी भी होती है । इनफ्लुएंसर बनने की होड़ में जो बच्चें पिछड़ रहे है वो खुद को हीन भावना से देखते है । करियर के लिए बहुत से विकल्प है लेकिन सही काउंसलर न होने के कारण बच्चें दिशाहीन हो रहे हैं । डिप्रेशन और ओवरथिंकिंग से बच्चों को बचने के लिए एक सही काउंसलर का होना जरुरी है । बच्चे के माता पिता को भी उन पर ध्यान देना चाहिए । क्योंकि अभी कॉम्पिटिशन का जमाना है और हीन भावना ही बच्चों को ज्यादा सोचने में मजबूर कर देती है, ऐसे में अभिभावक और बच्चे के बीच तालमेल और बातचीत बहुत जरुरी है।
वरिष्ठ एडवोकेट ने यह कहा
दीपसी रुद्रा भौमिक, एडवोकेट ने कहा कि जैसे-जैसे सोशल मीडिया का दौर आया वैसे-वैसे बच्चे विभिन्न तरह के खेल व एक्टिविटी से दूर हो गए है । अभी के बच्चे अकेले पड़ रहे है। एक समय ऐसा था जो बच्चें अपने दोस्त, माता-पिता, संबंधियों के बीच घिरे रहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब तो रोते बच्चों को चुप करना और खाना खिलाना भी एक अभिभावक मोबाइल के जरिए करते है । जब अभिभावक अपने काम में व्यस्त रहते है तो वे बच्चों को समय नहीं दे पाते और अभी के समय अकेलेपन के कारण भी वे डिप्रेशन और ओवरथिंकिंग के शिकार हो रहे है । माता पिता को बच्चे के साथ प्रेमपूर्वक बर्ताव करना चाहिए ताकि वो खुल कर बात कर सके, जिससे वे खुदकों सुरक्षित भी महसूस करेंगे । खेल व विभिन्न एक्टिविटी में बच्चों के साथ यदि अभिभावक भी शालिम हो तो वे खुदको अकेला महसूस नहीं करेंगे। जितना हो सके मोबाइल और सोशल मीडिया की बनावटी दुनियां से बच्चों को दूर रखे, उनसे आत्मीयता बर्ताव रखे।
शिक्षक ने यह कहा
डॉ. अजय कुमार साव सिलीगुड़ी कॉलेज हिंदी विभाग के प्रमुख ने कहा कि मीडिया के जरिए बाजार डाइनिंग टेबल से बेडरूम तक पसरा हुआ है। ऐसे में बच्चों की चाहतें आसमान छू रही हैं | जबकि माता-पिता के पास समय भी नहीं है उनसे बात करें। बच्चें दोस्त व संगत से नई-नई अपेक्षाओं से जुड़ जाते हैं और अपेक्षा पूरा नहीं होने पर वो टूट भी जाते है | इसलिए स्वस्थ पेरेंटिंग के लिए माता-पिता की यथासंभव काउंसलिंग की जानी चाहिए ताकि तमाम व्यवस्थाओं के बीच बच्चों से बातें करने का और आपसी आचरण को भी स्वस्थ करने का बोध उनमें जग पाए। खेल, नृत्य, गीत-संगीत, चित्रांकन जैसी एक भी कला में यदि बच्चा रुचि ले तो उसका व्यक्तित्व कुछ सृजनात्मक दिशा में निर्मित हो सकता है। एकल परिवार से भौतिक सुख सुविधा तो मिलती है, लेकिन आत्मीय साथ नहीं मिल पाता, ऐसे में माता पिता को सूझबूझ से फैसले लेने होंगे | शिक्षण संस्थानों में नंबर देखने-दिखाने से अच्छा बच्चों की परेशानियों को साझा करने का अवसर दें।
वरिष्ठ एडवोकेट ने यह कहा
दीपसी रुद्रा भौमिक, एडवोकेट ने कहा कि जैसे-जैसे सोशल मीडिया का दौर आया वैसे-वैसे बच्चे विभिन्न तरह के खेल व एक्टिविटी से दूर हो गए है । अभी के बच्चे अकेले पड़ रहे है। एक समय ऐसा था जो बच्चें अपने दोस्त, माता-पिता, संबंधियों के बीच घिरे रहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब तो रोते बच्चों को चुप करना और खाना खिलाना भी एक अभिभावक मोबाइल के जरिए करते है । जब अभिभावक अपने काम में व्यस्त रहते है तो वे बच्चों को समय नहीं दे पाते और अभी के समय अकेलेपन के कारण भी वे डिप्रेशन और ओवरथिंकिंग के शिकार हो रहे है । माता पिता को बच्चे के साथ प्रेमपूर्वक बर्ताव करना चाहिए ताकि वो खुल कर बात कर सके, जिससे वे खुदकों सुरक्षित भी महसूस करेंगे । खेल व विभिन्न एक्टिविटी में बच्चों के साथ यदि अभिभावक भी शालिम हो तो वे खुदको अकेला महसूस नहीं करेंगे। जितना हो सके मोबाइल और सोशल मीडिया की बनावटी दुनियां से बच्चों को दूर रखे, उनसे आत्मीयता बर्ताव रखे।
शिक्षक ने यह कहा
डॉ. अजय कुमार साव सिलीगुड़ी कॉलेज हिंदी विभाग के प्रमुख ने कहा कि मीडिया के जरिए बाजार डाइनिंग टेबल से बेडरूम तक पसरा हुआ है। ऐसे में बच्चों की चाहतें आसमान छू रही हैं | जबकि माता-पिता के पास समय भी नहीं है उनसे बात करें। बच्चें दोस्त व संगत से नई-नई अपेक्षाओं से जुड़ जाते हैं और अपेक्षा पूरा नहीं होने पर वो टूट भी जाते है | इसलिए स्वस्थ पेरेंटिंग के लिए माता-पिता की यथासंभव काउंसलिंग की जानी चाहिए ताकि तमाम व्यवस्थाओं के बीच बच्चों से बातें करने का और आपसी आचरण को भी स्वस्थ करने का बोध उनमें जग पाए। खेल, नृत्य, गीत-संगीत, चित्रांकन जैसी एक भी कला में यदि बच्चा रुचि ले तो उसका व्यक्तित्व कुछ सृजनात्मक दिशा में निर्मित हो सकता है। एकल परिवार से भौतिक सुख सुविधा तो मिलती है, लेकिन आत्मीय साथ नहीं मिल पाता, ऐसे में माता पिता को सूझबूझ से फैसले लेने होंगे | शिक्षण संस्थानों में नंबर देखने-दिखाने से अच्छा बच्चों की परेशानियों को साझा करने का अवसर दें।