संस्कारित करेगी "प्रकृति की पाठशाला"

Pathshala
प्रकृति की पाठशाला
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प्रकृति की पाठशाला बच्चों और युवाओं को प्रकृति के सानिध्य में सीखने, भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने तथा पर्यावरण संरक्षण को जीवन का संस्कार बनाने का अवसर प्रदान करेगी...।

हाल ही में उत्तराखंड स्थित भारत के पहले लेखक गांव में प्रकृति की पाठशाला का आरंभ एवं स्थापना की गई है। इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री, लेखक गांव के संस्थापक- संरक्षक, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि- भारतीय संस्कृति में प्रकृति को जीवन का प्रथम गुरु माना गया है। प्रकृति की पाठशाला बच्चों और युवाओं को प्रकृति के सानिध्य में सीखने, भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने तथा पर्यावरण संरक्षण को जीवन का संस्कार बनाने का अवसर प्रदान करेगी...। गौरतलब है कि वर्ष 2024 में देवभूमि उत्तराखंड के थानो (देहरादून) में भारत का पहला लेखक गांव स्थापित हुआ। लेखक गांव की यह संकल्पना साहित्य, कला एवं संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन के साथ-साथ लेखकों की सृजनशीलता को संरक्षण एवं आश्रय देने के लिए हुई है।

प्रकृति की गोद में बसा यह लेखक गांव जहां साहित्य, कला एवं संस्कृति से जोड़ता है वहीं अध्यात्म, स्वास्थ्य और ज्ञान परंपराओं का भी जीवंत केंद्र बन रहा है।

यह भी विदित हो कि वर्ष 2024 से ही यह स्थान साहित्य, कला, संस्कृति, प्रकृति-पर्यावरण, शोध- अनुसंधान एवं नवाचार का केंद्र बनता जा रहा है। देश-विदेश के हजारों साहित्यकार और युवा विद्यार्थी- शोधार्थी इस तीर्थ बन चुके स्थान पर पहुंचे हैं। प्रकृति की गोद में बसा यह लेखक गांव जहां साहित्य, कला एवं संस्कृति से जोड़ता है वहीं अध्यात्म, स्वास्थ्य और ज्ञान परंपराओं का भी जीवंत केंद्र बन रहा है। संजीवनी वाटिका, नवग्रह वाटिका, भगवान धन्वंतरि की भव्य प्रतिमा, नागराज का उत्तराखंड की शैली में बना भव्य- दिव्य मंदिर, नालंदा पुस्तकालय आदि इस स्थान को उत्कृष्टता प्रदान करते हैं तो वहीं लेखक गांव के केंद्र में गौरव से लहराता तिरंगा भारत भाव से जोड़ता है। यहां से आधार और आकार ले रही शिवालिक पर्वतमाला सुंदर दृश्य प्रस्तुत करती हैं तो घाटी से उठाते हुए बादल मेघदूत की संकल्पना को साकार करते हैं। आगामी 25-27 अक्टूबर 2026 को इस वर्ष का अंतरराष्ट्रीय लेखक गांव महोत्सव की घोषित हो चुकी है। इस बीच यहां "प्रकृति की पाठशाला" का भाव आरंभ और स्थापना जन-जन को प्रकृति- पर्यावरण का महत्व समझाने एवं प्रकृति- पर्यावरण के संरक्षण- संवर्धन की दिशा में सहभागी बनने का अवसर प्रदान करेगी।

संजीवनी वाटिका, नवग्रह वाटिका, भगवान धन्वंतरि की भव्य प्रतिमा, नागराज का उत्तराखंड की शैली में बना भव्य- दिव्य मंदिर, नालंदा पुस्तकालय आदि इस स्थान को उत्कृष्टता प्रदान करते हैं तो वहीं लेखक गांव के केंद्र में गौरव से लहराता तिरंगा भारत भाव से जोड़ता है।

ध्यातव्य है कि अग्नि, जल, वायु , धरती, आकाश, नदी, पर्वत, वृक्ष, वनस्पतियां, झरने, पोखर और विभिन्न जीव जंतुओं से मिलकर प्रकृति- पर्यावरण की संकल्पना आकार लेती है। यह भी ज्ञात हो कि पिछले कुछ वर्षों से ये सभी पर्यावरणीय घटक निरंतर प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती बन रही है, तो जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, धरती का प्रदूषण आदि संकट भी दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना जारी है। जिससे समय-समय पर आपदाएं बढ़ रही हैं।

विगत कुछ वर्षों में भारत सहित समूचा विश्व नीड़ कल्चर से ग्रीड कल्चर की ओर तेजी से बढ़ रहा है। व्यापक स्तर पर प्लास्टिक का उत्पादन एवं प्रयोग एक बड़ी चुनौती बन रहे हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा त्येन त्यक्तेन भुञ्जिथा...के माध्यम से त्यागपूर्वक उपभोग का संदेश देती है, लेकिन मनुष्य की अधिकाधिक दोहन व सब कुछ अभी पाने की लालचवृत्ति के कारण समूची जीव सृष्टि के समक्ष अस्तित्व का संकट खड़ा है। विगत कुछ वर्षों में भारत सहित समूचा विश्व नीड़ कल्चर से ग्रीड कल्चर की ओर तेजी से बढ़ रहा है। व्यापक स्तर पर प्लास्टिक का उत्पादन एवं प्रयोग एक बड़ी चुनौती बन रहे हैं। भिन्न-भिन्न रूपों में अशोधित कचरा एक बड़ी चुनौती के रूप में हमारे सामने है। जल स्रोतों के प्रदूषण से सिंचाई के जल एवं पेयजल की उपलब्धता निरंतर घटती जा रही है। असमय वर्षा, अधिक वर्षा, कम वर्षा, अधिक गर्मी,अधिक सर्दी सामान्य बात हो रही है।

कहीं सूर्य पूजा तो कहीं अग्नि की पूजा, कहीं जल की पूजा तो कहीं वायु की पूजा, कहीं धरती की पूजा तो कहीं पेड़ों की पूजा, कहीं जीव जंतुओं की पूजा तो कहीं उन सब की पूजा जो उसके जीवन के लिए आवश्यक थे।

मनुष्य के आसपास धरती, जल, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, पहाड़, हवा, पेड़-पौधे, वनस्पतियां और भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव- जंतुओं से मनुष्य का सहचर्य अथवा परिचय प्रगाढ़ और निरंतर था। वह केवल अपने लिए नहीं सोचता था अपितु अपने सहचर्य में रहने वाले इन सभी घटकों का भी चिंतन-वंदन करता था। कहीं सूर्य पूजा तो कहीं अग्नि की पूजा, कहीं जल की पूजा तो कहीं वायु की पूजा, कहीं धरती की पूजा तो कहीं पेड़ों की पूजा, कहीं जीव जंतुओं की पूजा तो कहीं उन सब की पूजा जो उसके जीवन के लिए आवश्यक थे। इस प्रकार इस जीवन पद्धति में उसका जीवन सहजता से चलता रहा। उस समय उसके आसपास न तो उद्योग थे और न ही  तीव्रगामी वाहन। न उसके पास जहरीला प्लास्टिक था और न ही हवा में घुला हुआ प्रदूषण। विकास क्रम में औद्योगिक क्रांति और अधिकाधिक उत्पादन की लालसा मनुष्य को भिन्न-भिन्न रूपों में पर्यावरणीय घटकों के दोहन की ओर लेकर जाने लगी। आज मनुष्य भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकृति एवं विभिन्न पर्यावरणीय घटकों का दोहन यानी शोषण करने वाला बना हुआ है। इसके घातक परिणाम अब मनुष्य सहित प्रत्येक जीवधारी को संकट में डाल रहे हैं।

विकास क्रम में औद्योगिक क्रांति और अधिकाधिक उत्पादन की लालसा मनुष्य को भिन्न-भिन्न रूपों में पर्यावरणीय घटकों के दोहन की ओर लेकर जाने लगी।
पाठशाला में पढे़ हुए ये पाठ उसके जीवन में नवीन सृजन  करते हैं। घर में मां की पाठशाला में अर्थात मां के सानिध्य में बालक अनेक बातें सिखाता है तो पाठशाला में उन बातों एवं अनुभवों का आगे विस्तार होता है।

पाठशाला एक ऐसा स्थान होता है जहां बालक अपने जीवन में नए-नए पाठ पढ़ता है। शिक्षा के माध्यम से और इन पाठों के माध्यम से नया सीखता है। ये पाठ उसके जीवन को संस्कारित करते हैं और उसे एक अच्छा नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं। पाठशाला में पढे़ हुए ये पाठ उसके जीवन में नवीन सृजन  करते हैं। घर में मां की पाठशाला में अर्थात मां के सानिध्य में बालक अनेक बातें सिखाता है तो पाठशाला में उन बातों एवं अनुभवों का आगे विस्तार होता है।    प्राकृतिक वातावरण में बनी यह प्रकृति की पाठशाला युवा विद्यार्थियों- शोधार्थियों एवं लेखक गांव में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों से, उसके महत्व, उसकी स्थिति एवं उसके संरक्षण-संवर्धन के लिए तैयार करेगी।  प्रकृति की यह पाठशाला वृक्ष मित्र, वन मित्र एवं प्रकृति के प्रहरी तैयार करेगी, ऐसी आशा है। (युवराज)

डॉ.वेदप्रकाश
असिस्टेंट प्रोफेसर

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