ज्ञान की ओर बच्चे का पहला कदम है 'हाथे खोरी' की परंपरा

सरस्वती पूजा और बच्चों का है खास नाता परंपरा की शुरुआत हुई है बंगाली संस्कृति से अक्षरारंभ, विद्यारंभ या प्रथम अक्षर संस्कार के नाम से मनाया जाता है भारत के कई हिस्सों में
ज्ञान की ओर बच्चे का पहला कदम है 'हाथे खोरी' की परंपरा
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प्रगति, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : 'हाथे खोरी' का सरस्वती पूजा से गहरा नाता और विशेष महत्व है। यह एक परंपरा है, जिसे बच्चों के जीवन में शिक्षा की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। माना जाता है कि इस परंपरा की शुरुआत बंगाली संस्कृति से हुई है, मगर अब यह केवल बंगाली समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के कई हिस्सों में बच्चों की शिक्षा की शुरुआत के लिए निभायी जाने वाली पारंपरिक रस्म है। भारत के कई हिस्सों में इसे अक्षरारंभविद्यारंभ या प्रथम अक्षर संस्कार के नाम से जाना जाता है। फर्क केवल स्थान और नाम का है, मगर परंपरा का उद्देश्य और महत्व समान है।

हाथे खोरी क्या है?

हाथे खोरी एक परंपरा है, जिसमें छोटा बच्चा पहली बार अपने हाथों से अपने जीवन का पहला अक्षर लिखता है। इस दिन बच्चे के हाथ में चॉक, पेंसिल या कलम पकड़ाकर उसे 'अ', 'ॐ' जैसे अक्षर लिखवाए जाते हैं। हाथे खोरी सरस्वती पूजा के दिन कराने का एक विशेष महत्व है, माना जाता है कि इस दिन बच्चे की शिक्षा की शुरुआत देवी के आशीर्वाद से होती है। इस दिन बच्चे द्वारा लिखा गया पहला अक्षर बच्चे के ज्ञान-पथ की नींव रखता है।

आज के समय में भी है महत्व

कहते हैं न कि दुनिया कितनी भी आगे बढ़ जाए, मगर हमें अपने रिवाज और संस्कारों को नहीं भूलना चाहिए। ठीक इसी प्रकार आज चाहे दुनिया काफी डिजिटलाइज हो गई है, मगर बच्चे के शैक्षणीक सफर की शुरुआत हाथे खोरी परंपरा के बाद ही होती है। डिजिटल युग में जहां बच्चों ने मोबाइल, टैब और कंप्यूटर को ही अपनी दुनिया बना लिया है, वहां आज भी यह परंपरा जीवित है। इससे यह सीख मिलती है कि चाहे दुनिया कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, परंपराओं और संस्कारों का महत्व कभी कम नहीं होता।

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