

भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती। वह मनुष्य की स्मृति, संवेदना, संस्कार और व्यक्तित्व की पहचान होती है। इसलिए जब कोई भाषा अपनी भौगोलिक सीमाएँ लाँघती है, और वह दूसरे देशों में पहुँचती है तो वह अपने साथ एक संस्कृति, एक जीवन-दृष्टि और एक पूरा अनुभव-संसार लेकर जाती है। हिंदी आज इसी यात्रा पर है।
कभी हिंदी को भारत की भाषा कहकर उसकी सीमा निर्धारित कर दी जाती थी। आज यह सीमा छोटी पड़ रही है। भारतीय डायसपोरा सारी दुनिया में है। हिंदी भारत से बाहर भी सुनाई देती है, पढ़ी जाती है, लिखी जाती है और पढ़ाई जाती है। फिल्मों, गीतों, साहित्य, पत्रकारिता और डिजिटल माध्यमों ने हिंदी को विश्व के अनेक हिस्सों तक पहुँचाया है। हवाई जहाज की सीटों पर , दुनिया के बड़े रेस्तरां में डिजिटल हिंदी दिख जाती है। लंदन की सड़कों पर हिंदी सुनाई दे सकती है। न्यूयॉर्क के किसी विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाई जा सकती है। मॉरीशस में हिंदी सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा है। फिजी, सूरीनाम और त्रिनिदाद में यह भारतीय प्रवासियों की ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ी हुई है। खाड़ी देशों में भी बड़ी संख्या में भारतीय हिंदी को दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं। यह वैश्विक हिंदी का नया व्यापक भूगोल है।
लेकिन वैश्विक होना केवल संख्या बढ़ना नहीं है। भाषा की वास्तविक वैश्विकता तब सिद्ध होती है, जब वह दूसरे समाजों के अनुभवों को भी अभिव्यक्ति देने लगे। हिंदी के सामने सबसे बड़ी संभावना यही है। आज इंटरनेट ने भाषा की दुनिया बदल दी है। पहले किसी लेखक को अपनी रचना पाठक तक पहुँचाने के लिए पत्रिका, प्रकाशक और डाक की आवश्यकता होती थी। अब एक मोबाइल फोन पर्याप्त है। एक शब्द लिखा और वह हजारों किलोमीटर दूर बैठे पाठक तक पहुँच गया। ब्लॉग ने हिंदी को डिजिटल दुनिया में प्रवेश दिया। सोशल मीडिया ने उसे गति दी। वीडियो ने दृश्यता दी। पॉडकास्ट ने उसे श्रव्य विस्तार दिया। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भाषा के सामने एक नई दुनिया खोल दी है। अब हिंदी केवल टाइप नहीं की जा रही। वह बोली जारही है, सुनी जा रही है, अनूदित हो रही है और तकनीक द्वारा समझी भी जा रही है।
मनोरंजन की भाषा से आगे
यहीं हिंदी की एक बड़ी संभावना छिपी है। भारत की विशाल जनसंख्या हिंदी के लिए व्यापक आधार है। हिंदी फिल्मों, संगीत, टेलीविजन और डिजिटल सामग्री का संसार इससे कहीं बड़ा है। किंतु लोकप्रियता और वैश्विक प्रतिष्ठा एक ही बात नहीं है। किसी भाषा के करोड़ों बोलने वाले होना महत्वपूर्ण है, लेकिन ज्ञान-विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, अर्थशास्त्र, कानून और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उसका सक्षम प्रयोग उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। हिंदी को मनोरंजन की भाषा से आगे बढ़कर ज्ञान की भाषा बनना होगा।
हिंदी के भविष्य की वास्तविक कसौटी
विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन हो, यह अच्छी बात है लेकिन हिंदी में आधुनिक ज्ञान भी उपलब्ध हो, यह उससे बड़ी बात है। यदि कोई विद्यार्थी भौतिकी पढ़ना चाहे, चिकित्सा समझना चाहे, अभियांत्रिकी , कृत्रिम बुद्धिमत्ता सीखना चाहे या वैश्विक अर्थव्यवस्था पर शोध करना चाहे, तो उसे उच्च गुणवत्ता की हिंदी सामग्री मिले। यही हिंदी के भविष्य की वास्तविक कसौटी होगी। जिस भाषा में केवल भावनाएँ हों, वह प्रिय हो सकती है लेकिन जिस भाषा में भावनाओं के साथ सामयिक ज्ञान भी उपलब्ध हो, वही दीर्घकाल में समर्थ बनती है।
हिंदी के सामने दूसरी बड़ी चुनौती अनुवाद की है। दुनिया में ज्ञान अनेक भाषाओं में निर्मित हो रहा है। हिंदी को उस ज्ञान से संवाद करना होगा। साथ ही हिंदी में निर्मित साहित्य और विचार को दुनिया की दूसरी भाषाओं तक पहुँचाना होगा। अनुवाद यहाँ सेतु बन सकता है। एक अच्छा अनुवाद केवल शब्दों को दूसरी भाषा में नहीं ले जाता। वह एक संस्कृति को दूसरी संस्कृति से परिचित कराता है। कबीर, तुलसी, प्रेमचंद, निराला, महादेवी और मुक्तिबोध की दुनिया जितनी हिंदी की है, उतनी ही विश्व-साहित्य की भी हो सकती है। आवश्यकता केवल संवेदनशील और उत्कृष्ट अनुवाद की है। इसी तरह दुनिया के श्रेष्ठ साहित्य का हिंदी में आगमन भी आवश्यक है। वैश्विक हिंदी एकतरफा यात्रा नहीं हो सकती। उसे खिड़की भी बनना होगा और दरवाजा भी।
एक और चुनौती है हिंदी की विविधता। हिंदी एकरूप नहीं है। उसके भीतर अनेक बोलियाँ, उच्चारण और सांस्कृतिक संसार हैं। अवधी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी सहित अनेक भाषिक परंपराओं ने हिंदी को समृद्ध किया है। वैश्विक हिंदी को इस विविधता से शक्ति लेनी चाहिए। उसे विविधता को कमजोरी नहीं समझना चाहिए। भाषा का विस्तार तब सुंदर होता है, जब वह अपने भीतर नए शब्दों के लिए स्थान बनाती है।
हिंदी को अंग्रेजी से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। संस्कृत, फारसी, अरबी, तुर्की, अंग्रेजी और अनेक भारतीय भाषाओं से हिंदी ने शब्द ग्रहण किए हैं। यही उसकी जीवंतता है। भाषा कोई बंद कमरा नहीं। वह खुली खिड़की है। लेकिन आत्मविश्वास और आत्महीनता के बीच एक महीन अंतर है। हिंदी को वैश्विक बनाने के नाम पर अपनी प्रकृति खो देना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, शुद्धता के आग्रह में उसे इतना कठिन भी नहीं बनाया जा सकता कि सामान्य व्यक्ति उससे दूर हो जाए। हिंदी का भविष्य उसकी सहजता में है।
आज का युवा हिंदी लिखता है तो कभी-कभी रोमन लिपि का सहारा लेता है। इसे केवल संकट मानकर नकार देना उचित नहीं। यह डिजिटल संक्रमण का संकेत भी है। हमें यह देखना होगा कि युवा हिंदी से जुड़ा रहे। धीरे-धीरे उसे देवनागरी और समृद्ध भाषा की ओर आकर्षित किया जा सकता है। तकनीक यहाँ बाधा नहीं, सहयोगी बन सकती है। हिंदी के लिए अच्छे फॉन्ट चाहिए। बेहतर वर्तनी-जाँच चाहिए। उच्चस्तरीय वाणी-पहचान तकनीक चाहिए। हिंदी में गुणवत्तापूर्ण खोज-सुविधाएँ चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के भाषा मॉडल हिंदी को गंभीरता से समझें, यह भी आवश्यक है। डिजिटल दुनिया में जिस भाषा के पास अच्छा डेटा होगा, वही भविष्य की तकनीक में अधिक सशक्त होगी। इसलिए हिंदी का डिजिटलीकरण केवल सुविधा का प्रश्न नहीं है। यह भविष्य की भाषिक सुरक्षा का प्रश्न भी है।
वैश्विक हिंदी की एक और बड़ी शक्ति भारतीय प्रवासी समाज है। प्रवासी भारतीय केवल भारत से बाहर रहने वाले लोग नहीं हैं। वे दो संस्कृतियों के बीच जीवित सेतु हैं। उनके घरों में हिंदी के शब्द पीढ़ियों को जोड़ सकते हैं। उनके उत्सव हिंदी को जीवित रख सकते हैं। उनकी अगली पीढ़ी हिंदी से जुड़ी रहे, इसके लिए भाषा को केवल भावुक स्मृति नहीं, उपयोगी और आकर्षक अनुभव बनाना होगा। बच्चे हिंदी इसलिए सीखें कि यह उनकी विरासत है। साथ ही इसलिए भी सीखें कि इससे उन्हें दुनिया समझने का एक अतिरिक्त दृष्टिकोण मिलता है। यही भावी हिंदी की दिशा हो सकती है।
सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। विश्वविद्यालयों की भूमिका महत्वपूर्ण है। साहित्यकारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन सबसे बड़ी भूमिका समाज की है। हिंदी दिवस पर भाषण देना सरल है। हिंदी में काम करना कठिन है। हिंदी के विस्तार के लिए केवल नारे नहीं चाहिए। अच्छे विद्यालय चाहिए। अच्छे शिक्षक चाहिए। उत्कृष्ट पुस्तकें चाहिए। गुणवत्तापूर्ण डिजिटल सामग्री चाहिए। विश्वस्तरीय शोध चाहिए। और सबसे अधिक चाहिए—हिंदी में काम करने का आत्मविश्वास।
हिंदी को किसी भाषा से लड़ना नहीं है। उसे अंग्रेजी को हटाना नहीं है। उसे दूसरी भारतीय भाषाओं से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी है। उसका लक्ष्य इससे बड़ा है। उसे संवाद की भाषा बनना है। ज्ञान की भाषा बनना है। संवेदना की भाषा बनना है। विश्व हिंदी का सपना तभी सार्थक होगा, जब हिंदी विश्व से कुछ कहे ही नहीं, विश्व की बात भी सुने। भाषा का वैश्वीकरण अंततः मनुष्य का वैश्वीकरण है। जब भोपाल का कोई लेखक लंदन में बैठकर हिंदी में लिखता है और उसे दिल्ली, मॉरीशस, न्यूयॉर्क या टोरंटो में कोई पाठक उसी क्षण पढ़ लेता है, तब दूरी केवल भौगोलिक रह जाती है। भाषा उन दूरियों को पार कर चुकी होती है। यही हिंदी की सबसे बड़ी संभावना है और शायद सबसे बड़ी चुनौती भी।
क्योंकि अब प्रश्न यह नहीं है कि हिंदी विश्व तक पहुँचेगी या नहीं। वह पहुँच चुकी है। प्रश्न यह है कि विश्व में पहुँचकर हिंदी क्या कहेगी । यदि उसके पास साहित्य की संवेदना, ज्ञान की शक्ति, तकनीक की गति और संवाद की उदारता होगी, तो वैश्विक हिंदी केवल भारतीय पहचान की प्रतिनिधि नहीं रहेगी। वह विश्व-संवाद की एक समर्थ भाषा बन सकती है।
भाषा की असली विजय तब होगी, जब हिंदी बोलने वाला केवल यह न कहे,
“मैं हिंदी जानता हूँ।”
बल्कि दुनिया कहे, “हिंदी में भी बहुत कुछ जानने को है।” (युवराज)
विवेक रंजन श्रीवास्तव