बढ़ती उम्र में बदलें अपनी जीवनशैली

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एक आयु के पश्चात वृद्धावस्था में मनुष्य का शरीर साथ छोड़ने लगता है। तब उसका

मन चाहे कितना ही उत्साहित हो पर उसका तन उतना फुर्तीला नहीं रह जाता। साठ

वर्ष की आयु के पश्चात सरकार भी मनुष्य को रिटायर कर देती है। इसका कारण

यही है कि दिन-प्रतिदिन मनुष्य की ऊर्जा का स्वाभाविक रूप से ह्रास होने लगता है।

उस समय शरीर ढलान की ओर होता है और ‘रिफ्लेक्सेज’ कमजोर होने लगते हैं।

मनुष्य का मन यह भ्रम बनाए रखता है कि ‘ये काम तो चुटकी में कर लूँगा’ परन्तु

सच्चाई बहुत शीघ्र समक्ष आ जाती है। ढलती आयु में शरीर के शिथिल होने के साथ

उसका शारीरिक बल क्षीण हो जाता है।

इस आयु यानी सीनियर सिटीजन होने पर कुछ बातों का मनुष्य को विशेष रूप से

ध्यान रखना चाहिए। वह उस समय धोखा खाता है जब मन कोई भी कार्य करने की

सोचता है और शरीर उसे करने में असमर्थ हो जाता है। परिणामस्वरूप मनुष्य का

एक्सीडेंट हो सकता है और उसे शारीरिक क्षति हो सकती है। फ्रैक्चर से लेकर हेड

इंज्यूरी तक होने की सम्भावना बनी रहती है। इसलिए मनुष्य को सदा ही सावधानी

बरतनी चाहिए। उसे हड़बड़ी में कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे लेने के

देने पड़ जाएँ। स्वयं तो वह कष्ट भोगेगा ही और दूसरे सेवा करने वाले भी परेशान

हो जाएँगे।

अपनी आवश्यकता की वस्तुओं को एक निश्चित स्थान पर ही रखने का अभ्यास करना

चाहिए जिससे उन्हें बिना परेशानी के हाथ बढ़ाकर उठाया जा सके या उन्हें सरलता

से ढूंढा जा सके। वृद्धावस्था में भूलने की बीमारी हो जाना स्वाभाविक होता है।

इसलिए आवश्यक वस्तुओं को ऐसे स्थान पर रखना चाहिए जिससे वे वस्तुएँ बिना

कठिनाई के सरलता से समय पर उपलब्ध हो सकें। अपनी दवाइयों को भी अपने

बिस्तर के पास ही किसी प्लास्टिक के डिब्बे में डालकर रखना चाहिए। उसमें अलग-

अलग प्लस्टिक की छोटी-छोटी थैलियों में दवाइयाँ डालकर, उन पर लिख लेना

चाहिए कि नाश्ते के बाद, भोजन के बाद या दोपहर-शाम को अथवा रात को। इसी

तरह दिन के अनुसार भी उन्हें अरेंज करके रखा जा सकता है।

प्रातः जागते ही तुरन्त बिस्तर छोड़कर खड़े होने के स्थान पर कुछ मिनट बिस्तर पर

बैठकर पूरी तरह चैतन्य हो जाना चाहिए। बैठे-बैठे ही पैर में चप्पलें पहनें या मेज,

दीवार आदि किसी सहारे को पकड़ कर चप्पलें पहनें। इस तरह करने से डगमगाकर

गिरने का खतरा नहीं रहता। इस आयु में कहीं ऊँची जगह पर पैर रख जाए अथवा

पैर फिसलकर गिरने का बहुत डर रहता है। गिरने की सबसे अधिक घटनाएँ बाथरूम

या टायलेट में ही होती हैं। वहाँ पानी होने के कारण पैर फिसलने का खतरा हमेशा

बना रहता है।

घर-परिवार में रहते हुए आवश्यकता पड़ने पर कोई भी सदस्य सहायता करने के लिए

आ सकता है। प्रयास यही करना चाहिए कि बाथरूम के दरवाजे को अन्दर से कुण्डी

न लगाएँ। किसी कारण से अकेले रहते हैं तो यह जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती

है। ऐसी स्थिति में जब तक किसी पड़ोसी या सम्बन्धी को सूचना नहीं दे सकेंगे तो

कोई सहायता नहीं कर सकेगा। प्रयास यही कारण चाहिए कि बाथरूम में जाते समय

अपना मोबाइल साथ लेकर जाइए ताकि कष्ट के समय किसी से सम्पर्क साधा जा

सके।

इस आयु में इंग्लिश कमोड का प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए। यह ऊँचा होता है

इसलिए इससे उठने में सरलता होती है। इसके पश्चात भी यदि सम्भव हो तो कमोड

के पास एक हैंडिल लगवा लेना चाहिए। कमजोरी होने की स्थिति में उसे पकड़कर

उठा जा सकता है। इसके साथ ही जमीन पर बैठकर स्नान करने के स्थान पर ऊँची

चौकी स्नानघर में रखनी चाहिए। उस पर बैठकर स्नान करने के पश्चात उठने में

सरलता होती है। अथवा सम्भव हो तो खड़े होकर स्नान करना चाहिए। बाथरूम के

फर्श पर रबर की मैट जरूर बिछाकर रखनी चाहिए। यह फिसलकर गिरने से बचाती

है। इसके अतिरिक्त गीले हाथों से टाइल्स लगी दीवार का सहारा नहीं लेना चाहिए।

इससे हाथ फिसलकर गिरने का डर बना रहता है।

बाथरूम के ठीक बाहर सूती मैट रखनी चाहिए ताकि गीले तलवों का पानी सूख जाए।

कुछ सेकेण्ड उस पर खड़े रहकर सावधानी से फर्श पर पैर रखना चाहिए।

युवावस्था की तरह जल्दबाजी करना उचित नहीं है। इसलिए अपने कपड़े आराम से

बैठकर पहनने चाहिए। इससे पैंट, पायजामे या सलवार आदि में पैर फँसकर गिरने

का डर नहीं होता। किसी भी प्रकार के वाहन का प्रयोग करते समय यदि किसी की

सहायता लेनी पड़े तो हिचकिचाना नहीं चाहिए। सीढ़ियों पर चढ़ते या उतरते समय,

सक्षम होने पर भी, सदा रेलिंग का सहारा लेकर धीरे-धीरे चढ़ना-उतरना चाहिए।

लिफ्ट का या एस्केलेटर का उपयोग करते समय भी सावधान रहना बहुत आवश्यक

होता है। सड़क पार करते समय किसी का सहारा लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।

किसी भी धार्मिक अथवा सामाजिक दायित्वों में शिरकत करते समय, वहाँ रखी कुर्सी

पर बैठना चाहिए। जमीन पर बैठने से बचना चाहिए।

वृद्धावस्था जीवन का एक पड़ाव है। इसमें घबराने की आवश्यकता नहीं है। बस यदि

थोड़ी सावधानियाँ बरती जा सकें तो वृद्धावस्था में बहुत-सी परेशानियों से बचा जा

सकता है। चन्द्र प्रभा सूद(स्वास्थ्य दर्पण)

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