

वास्तव में ही यह जिंदगी बड़ी हसीन है पर इसका आनंद विवाहोपरान्त ही लिया सकता है जब अपने घर में एक खूबसूरत और बेपनाह मुहब्बत करने वाली पत्नी हो पर पति-पत्नी के खूबसूरत, पाक रिश्ते में प्रगाढ़ता तभी आती है जब पति-पत्नी में थोड़ा रूठने-मनाने का किस्सा चलता रहता है। रूठने-मनाने का किस्सा रिश्ते में ऐसी मधुरता बिखेर देता है, इतनी गहराई ला देता है कि क्या कहना?
पर आजकल की इस भागदौड़ की जिंदगी में रूठने-मनाने के महत्व को पति पत्नी लगभग भूल से गए हैं। पति को अपने व्यवसाय कारोबार से फुर्सत नहीं, पत्नी को अपने आफिस से या अन्य कामों से समय नहीं मिलता। पति पत्नी दोनों ने ही पैसे कमाने की होड़ में अपने को इस कदर व्यस्त कर रखा है कि एक-दूसरे से साथ बैठकर दो घड़ी बात करने की फुर्सत नहीं। पति पत्नी का रिश्ता औपचारिक रिश्ता बन कर रह गया है।
पति-पत्नी के दरमियां वह मधुरता बहुत कम देखने को मिलती है जो वास्तव में दिखनी चाहिए और देखने को मिले भी तो कैसे? पति-पत्नी स्वयं अपनी भूमिका तक भूलते जा रहे हैं। इसका मूल कारण पैसा कमाने की होड़ और पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण है, इसीलिए तो अब पति-पत्नी, पति पत्नी न होकर वाइफ एण्ड हसबैण्ड बन कर रह गये हैं। ऐसे पति-पत्नियों की जीवनशैली यंत्रवत हो गई है।
आधुनिक पति-पत्नी के दरमियां भले ही शारीरिक रूप से कोई फासला न बना हो पर मानसिक तौर पर उनके रिश्ते के दरम्यिां एक पतली रेखा खिंच ही गई है। आधुनिक पति-पत्नियों में एक-दूसरे के प्रति हार्दिक प्यार का लबालब सागर शायद ही दिखाई पड़े कहीं।
अपनी संस्कृति की, सभ्यता को लेकर सोचें तो पति-पत्नी का इस प्रकार का जीवन सरासर गलत है। ऐसे पति-पत्नी तो वास्तविक पति-पत्नी के प्यार, पवित्रता और समर्थन से बने रिश्ते की एक तरह से हत्या कर रहे हैं इसीलिए तो आधुनिक पति-पत्नी से जुड़े सारे रिश्तों में न वह अपनापन दिखता है, न वह मधुरता होती है, न गहराई। बस औपचारिकता ही औपचारिकता भरी रहती है। उनके घर में हर भौतिक सुख साधन उपलब्ध है पर वास्तविक प्यार की चंद फुहारें शायद ही मिलें।
जो प्यार एक फूस की झोंपड़ी में रहने वाले मजदूर पति पत्नी में मिलेगा, शायद ही वह प्यार बड़ी-बड़ी कोठियों और फ्लैटों में रहने वाले मियां बीवी में मिले क्योंकि आधुनिकता की दौड़, पैसे कमाने की होड़ और पाश्चात्य देशों की सभ्यता संस्कृति के अनुकरण ने उनके हर रिश्ते को कागजी और औपचारिक बना कर रख दिया है।
अगर आधुनिक पति-पत्नियों ने पुनः अपनी भारतीय सभ्यता संस्कृति का दामन नहीं थामा, अपनी वास्तविक भूमिका को नहीं पहचाना, भले ही वे कितना भी पैसा कमा लें, उनका घर कोठी, फ्लैट और अन्य शानदार नाम से भले ही पुकारा जाने लगे पर वह घर, जिसे प्यार का मन्दिर कहते हैं, कभी नहीं बन सकता। प्रेम कुमार(उर्वशी)