तनावमुक्त होने का सरल मार्ग है नृत्य व संगीत

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तनावमुक्त होने का सरल मार्ग है नृत्य व संगीत
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कहते हैं संगीत आत्मा की खुराक है और यदि स्वस्थ-आत्मा हो तो शरीर भी स्वस्थ रहता है। आत्मा, मन और शरीर का बड़ा ही सीधा संबंध है। यदि आपका मन स्वस्थ है तो आपका शरीर भी स्वस्थ रहता है। आज के भागदौड़ के युग में सभी लोग  टेंशन और तनाव से ग्रस्त हैं। तनाव-मुक्त होने का सबसे सस्ता और सुगम मार्ग है - संगीत।

संगीत के कई रूप हैं-गायन, वादन और नृत्य। गायन भी कई किस्म का होता है-

कच्चा, पक्का, फिल्मी, शास्त्रीय । संगीत वही, जो आप के मन की संगत करता है, जो आपको अच्छा लगता है, चाहे वह पॉप हो या रॉक, पंजाबी हो या हिंदी। संगीत की कोई भाषा नहीं होती। हर गीत में कुछ आधारभूत मान्यता होती है जैसे सुर, ताल, लय, धुन, मींड आदि सभी संगीत, जो सुर-ताल में हो, वह मन को अच्छा लगता है। संगीत का सीधा प्रभाव मन, आत्मा, शरीर पर पड़ता है।

संगीत से मन को सुख और चैन मिलता है। व्यक्ति वर्तमान व भविष्य से कट जाता है। शराब जैसा नशा होता है संगीत में। गायन की क्रिया वायु से होती है। आवाज निकालने पर प्राणायाम हो जाता है जैसे ‘ओम‘ का शब्द निकालने से स्वर-साधना होती है। इसी प्रकार आ आ आ शब्द का उच्चारण करने से मन और शरीर पर प्रभाव पड़ता है। इसे ‘यौगिक-स्वास्थ्य साधना‘- कहते हैं। खून साफ होता है। दिमाग व शरीर के सभी भागों को शुद्ध रक्त मिलता है।

नृत्य भी स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी है। हर प्रांत का अपना-अपना प्रांतीय नृत्य है। पंजाब का भंगड़ा, शास्त्रीय नृत्य में, भरत नाटयम्, कथकली, मणिपुरी, कुचिपुड़ी नृत्यों से हमारे शरीर के सभी अंगों का समुचित व्यायाम हो जाता है। नृत्य से अंग-अंग की मांसपेशियों का व्यायाम हो जाता है।  इससे शरीर का समुचित विकास होता है। दिल की धड़कन की गति बढ़ जाती है। ज्यादा ऑक्सीजन का संचार होता है। चर्बी घटती है। शरीर सामान्य रहता है, मोटापा नहीं होता।

नृत्य की मुद्राएं, एक ताल, दादरा त्रिताल और लय और स्वरों का प्रभाव मन पर भी होता है, जिससे मन प्रसन्न रहता है। छुट-पुट रोग तो पास तक नहीं फटकते।

संगीत का गायक, वादक, नर्तक, श्रोता, दर्शक सभी पर यथा-योग्य प्रभाव जरूर पड़ता है। संगीत सुनने, गाने और बजाने पर कृष्ण जी की बांसुरी सुनने पर गोपियां तो क्या, गाएं तथा पक्षी भी मग्न हो जाते थे। सितार जब बजते हैं तो मन के तार झनझना उठते हैं। तबले की ताल पर पैर अपने आप थिरकते हैं।

सुर-ताल पर सिर झूमने लगता हैं। सितार की मींड रोगी के गिरते हुए हृदय को ऊंचा उठा देती है। आज ही प्रण कीजिए-आप अभी उठें और किसी भी प्रकार के संगीत से जुड़ जाएं। कुछ बजाना सीखिए, कुछ गाना सीखिए। नृत्य कीजिए, नहीं तो अपनी मनपसंद गायक और गायिका की कैसेट लगा कर आंखें बंद करके सुनें। आप आत्म-विभोर हो जाएंगे। आप बीमार हैं तो तंदुरूस्त हो जाएंगे। उदास हैं तो प्रसन्न हो जाएंगे।  विजेन्द्र कोहली(स्वास्थ्य दर्पण)

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