चिकित्सा से बचाव भला

सेहत चर्चा
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प्रकृति जब मनुष्य को जन्म देती है, तब वह प्रायः पूर्णतया निरोग होता है। कोमल, चमकीली त्वचा, लाल होंठ, हथेलियां और तलुए तक लाल। हंसना, मुस्कुराना, रोना केवल तब, जब कोई आवश्यकता हो।

आयु बढ़ने के साथ-साथ आहार-विहार गलत होने से रोग मनुष्य के शरीर में जड़ जमाने लगते हैं। आगे चलकर ये रोग रोगी को बहुत कष्ट देते हैं। रोग होने के बाद उसका इलाज किया जाए, इससे अच्छा यह है कि रोग होने से पहले ही उससे बचाव का उपाय किया जाए।

हमारा शरीर एक बढ़िया यंत्र है। यह अपने जीवित रहने के लिए आहार ढूंढता है। आहार को खाकर, पचाकर यह चलने फिरने और काम करने के लिए शक्ति प्राप्त करता है। देर तक आहार न मिले तो मनुष्य की शक्ति कम हो जाती है परन्तु जो आहार हम खाते हैं, उसे पचाने में भी शरीर की शक्ति व्यय होती है। यदि हमारा भोजन आवश्यकता से अधिक होगा और दुष्पच होगा तो रोग होने की संभावना बढ़ जायेगी।

स्वादिष्ट बनाया गया भोजन आवश्यकता से अधिक खाया जाता है। अधिक भोजन विष से कम नहीं है। दुनिया में जितने लोग भोजन न मिलने से मरते हैं, उससे कई गुना अति भोजन से मरते हैं। जो भोजन ठीक से हजम न हो पाया हो, वह कई बार वमन में निकल जाता है। वह फिर भी बेहतर है।

जो अनपचा भोजन दस्तों के रूप में भी बाहर नहीं निकल पाता, वह कब्ज होकर आंतों में चिपका रहता है और सड़ता रहता है। उसके फलस्वरूप तरह-तरह के रोग उत्पन्न होते हैं। अनपचे भोजन से बनने वाला अन्नरस दूषित होता है और दूषित अन्न रस से रक्त दूषित हो जाता है। दूषित रक्त ही दमा, गठिया, रक्तचाप, मधुमेह आदि रोगों का जनक है। उचित आहार में केवल भोजन की मात्रा ही नहीं, उसका समय भी नियत होना चाहिए। नियत समय पर भोजन करने से पाचन सही होता है।

भोजन इतना करना चाहिए कि कुछ भूख बची रहे। वे लोग स्वस्थ रहते हैं जिन्हें भरपेट खाने को नहीं मिलता। पानी दिन में कम से कम आठ गिलास पीना चाहिए। इससे शरीर के बहुत से विषैले तत्व मूत्र तथा पसीने के मार्ग से बाहर निकल जाते हैं। पर्याप्त पानी पीने से कब्ज भी नहीं होती।

भोजन और पानी के बाद है व्यायाम। सभी स्वस्थ प्राणी खेलकूद, भाग-दौड़ पसन्द करते हैं। स्वस्थ व्यक्ति भी खेलते-कूदते हैं और उनका व्यायाम हो जाता है पर अधिकांश किसान, मजदूर और क्लर्क ऐसे कामों में लगे होते हैं कि पूरी तरह व्यायाम नहीं हो पाता क्योंकि श्रम व्यायाम नहीं है। व्यायाम से सब अंगों में रक्त का संचार सही हो जाता है। सांस तेज चलता है तो फेफड़ों में वायु पूरी तरह पहुंचती है और रक्त शुद्ध होता है। जिन लोगों को खेल और व्यायाम की सुविधा नहीं है वे आसनों और प्राणायाम से भी काम चला सकते हैं।

भोजन में पृथ्वी तत्व है, जल में जल तत्व है, वायु में वायु तत्व है। अग्नि तत्व हमें सूर्य की धूप प्राप्त होती है। कपड़े पहनने की आदत डालकर हमने स्वयं को सूर्य की धूप से वंचित कर लिया है। प्रतिदिन कुछ समय कपड़े उतार कर धूप में बैठने से भी जीवनी शक्ति बढ़ती है। आकाश तत्व इन सबसे महत्वपूर्ण है।

जितना समय मनुष्य खुले आकाश के तले बिता सके, उतना स्वास्थ्य के लिए हितकर है। रात को खुले आकाश के तले सोना लाभकारी है। इसमें मौसम का ध्यान रखना अवश्य होगा।

पांचों तत्वों की सहायता के अलावा उचित विश्राम भी मनुष्य के लिए आवश्यक है। दिनभर दौड़-धूप और परिश्रम के बाद उसे यथेष्ट विश्राम भी मिलना चाहिए। यह विश्राम नींद से मिलता है, इसलिए स्वस्थ रहने के इच्छुक मनुष्य को आठ घण्टे सोना ही चाहिए। धन कमाने के लोभ में बहुत लोग भोजन और नींद की उपेक्षा कर देते हैं। भोजन और शयन समय पर होना ही चाहिए। नहीं होगा तो कई गुना कीमत चुकानी पड़ेगी। सूर्योदय से पहले नींद पूरी कर उठ जाना चाहिए।

हमारे शरीर में जब तक कोई विषैला विजातीय तत्व प्रविष्ट न हो, तब तक कोई रोग नहीं होगा। विजातीय तत्व, अन्न, जल, सांस में ली जाने वाली वायु द्वारा शरीर में प्रविष्ट हो सकते हैं। कुछ रोगाणु त्वचा से भी प्रविष्ट हो जाते हैं, जैसे खुजली, दाद आदि। विषैले विजातीय तत्व सर्वत्रा, वायु तक में विद्यमान रहते हैं परन्तु स्वस्थ शरीर उनसे लड़कर उन्हें बाहर निकालता रहता है। विपत्ति तब आती है, जब किन्हीं कारणों से हमारी जीवनी शक्ति कमजोर हो जाती है और वह रोगाणुओं से लड़ने में असमर्थ हो जाती है। उस दशा में रोग हावी हो जाता है।

जीवनी शक्ति को सबल बनाये रखने का उपाय है सुपच, परिमित भोजन। सुपच का अर्थ है फल, फलों का रस, सब्जियां, सब्जियों का सूप, ताजा दूध, दही, अंकुरित अन्न, आदि। परिमित का अर्थ है न अधिक, न कम।

जितना हजम हो जाये, उतना भोजन समय पर खाया जाए। भोजन को चबा-चबा कर, स्वाद लेकर धीरे-धीरे खाना चाहिए। जल्दबाजी में भागते-भागते किया गया भोजन शरीर को शक्ति नहीं देता।

यदि हम जीवन को स्वाभाविक बनाये रखें तो आहार, विहार, परिश्रम और शयन सब उचित बने रहते हैं परन्तु कठिनाई यह है कि सभ्यता के विकास के साथ-साथ हम प्राकृतिक दशाओं से दूर होते जाते हैं। शहरों के विकास के कारण हमें ताजा फल सब्जियां नहीं मिलती; डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ मिलते हैं। विहार की सुविधा कम होती जाती है। परिश्रम उचित नहीं रह पाता।

कुछ लोग अत्यधिक परिश्रम करते हैं और कुछ लोग तो बिल्कुल ही नहीं करते। जो लोग मोटर गाड़ियों के अभ्यस्त हो जाते हैं, उन्हें परिश्रम करने के लिए व्यायाम करना पड़ता है। यही हाल शयन का भी है। जब तक बिजली के प्रकाश का आविष्कार नहीं हुआ था, तब लोग जल्दी सो जाते थे परन्तु अब तो अधिकांश लोग निशाचर हो गये हैं। वे रात को बारह बजे सोते हैं और सवेरे आठ बजे उठते हैं। जब एक बार हम शरीर की आदत बिगाड़ लेते हैं तब फिर उसे सुधारना कठिन हो जाता है। सुदेश आर्या(स्वास्थ्य दर्पण)

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