खतरनाक है सेहत के लिए आवेश

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खतरनाक है सेहत के लिए आवेश
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आजकल के नवयुवकों को ’आवेश‘ की बीमारी ने जबरदस्त जकड़ रखा है। आवेश एक प्रकार का तूफान है। आजकल के युवकों के मन के जरा भी प्रतिकूल बात हुई नहीं कि झट से आवेश उनके दिमाग पर हावी हो जाता है और ऐसे हालात में आदमी हत्या, आत्महत्या या इसी प्रकार के अन्य कोई अपराध कर बैठता है।

आवेशों का उद्वेग व्यक्ति को कमोबेश विवेक-शून्य कर देता है परन्तु आवेश के वक्त यदि आदमी जरा भी ठहर जाये और कुछ वक्त गुजर जाने दे तो उस संकट को झेलने या टालने की शक्ति उसमें खुद-ब-खुद पनप ही जायेगी। वक्त का मरहम लगने पर ’रेशनैलिटी‘ अपने आप ही आयेगी।

यदि आप किसी आकस्मिक दुर्घटना, मृत्यु, शोक, हानि, चिन्ता, कलह या अन्य किसी भयंकर कष्ट से पीड़ित हैं तो उत्तेजना, हड़बड़ी या त्वरित आवेश में आकर कोई काम न करें। मन के शान्त और संतुलित होने के बाद ठंडे मन से विचार करके ही कोई कदम उठाएं। आवेश के वक्त लिया गया निर्णय आत्मघाती साबित हो सकता है और बाद में आपको हाथ मलने के अलावा कुछ हासिल न होगा।

आपके जीवन में गाहे-ब-गाहे कई संकट आयेंगे तथा आप ऐसा महसूस करेंगे कि गोया आपका अन्त समीप आ गया है। बचने की कोई गुंजाइश ही नहीं है। चारों ओर गहरी निराशा का घना कोहरा ही दिखाई देगा। तब भी हो सकता है आपको आवेश आये पर ’सब दिन होत न एक समान‘ की उक्ति को ध्यान में रखकर आप उस हालात का जिन्दादिली से मुकाबला करें।

आवेशों से बचने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि मन को सदा कल्याणकारी व रचनात्मक विषयों में लगाया जाये। इससे मन एकाग्र होगा। ज्यों-ज्यों मानसिक एकाग्रता बढ़ेगी, आवेशों से छुटकारा मिलेगा। आवेशों से बचने की खातिर आदमी को सकारात्मक सोच बनानी चाहिए। अमूमन लोग अशुभ विचारों तथा अप्रिय विचारों का चिन्तन करते रहते हैं। इससे आवेश तो कम होते ही नहीं, अलबत्ता आदमी क्रोधी और बन जाता है। लिहाजा आप अपनी सोच और ख्यालात को पॉजिटिव बनायें।

आवेशों के तूफान से बचने की खातिर जहां आचार-विचार व रहन-सहन का सही होना निहायत जरूरी है, वहीं खान-पान का भी कोई कम महत्त्व नहीं। चटपटा व गरिष्ठ भोजन खाने वाला मनुष्य जल्द ही आवेशित होता है। अतएव ’सादा जीवन, उच्च विचार‘ को यदि आप अपनाएंगे तो कदाचित ही आवेशों के तूफान आप पर हावी हो पायेंगे।

यदि आप अपने व्यक्तित्व को सौम्य दर्शाना चाहते हैं तो आपको आवेशों के तूफान में हरगिज नहीं बहना है। अच्छी सोहबत व उच्च साहित्य के पठन से अपना व्यक्तित्व ऊपरी और आन्तरिक तौर पर बखूबी संवार सकते हैं। बस आवश्यकता है आवेश के तूफान से बचने की। प्रदीप जोशी(स्वास्थ्य दर्पण)

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