आयुर्वेद शास्त्र के अनुरूप करें मसालों का प्रयोग

आयुर्वेद
आयुर्वेद शास्त्र के अनुरूप करें मसालों का प्रयोग
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आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार इस संसार में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जिसका प्रयोग स्वास्थ्य को स्वस्थ रखने में नहीं किया जा सकता। वनस्पति जगत, प्राणी जगत और खनिज से प्राप्त होने वाले द्रव्यों का शरीर पर होने वाले गुण-दोषों का अध्ययन करके विभिन्न प्रकार के बलवर्द्धक, स्वास्थ्य रक्षक, रोग प्रतिरोधक, रुचिकर, पथ्यकर आदि के रूप में व्यवहार किया जा सकता है।

मसालों का व्यवहार खाद्य पदार्थों में सिर्फ स्वाद एवं रंग के परिवर्तन के निमित्त ही नहीं किया जाता बल्कि उनमें अनेक औषधीय गुण भी विद्यमान होते हैं। कुछ प्रमुख मसालों में छिपे औषधीय गुणों की चर्चा यहां की जा रही है।

धनियाः- आयुर्वेद के अनुसार धनिया मूत्राल, पाचन, दीपन व तृष्णा शामक गुणों से युक्त होता है। इसका प्रयोग अजीर्ण, उल्टी रोकने, अतिसार रोकने, ज्वर दाह एवं तृष्णा को रोक कर शान्ति को प्रदान करने के लिए किया जाता है। मिश्री के साथ धनिए के चूर्ण को खाने से खूनी बवासीर में लाभ होता है। धनिया का पानी श्वेतप्रदर, स्वप्नदोष में लाभकारी होता है। धनिया के चूर्ण को घी में पकाकर चीनी मिलाकर खाते रहने से यौन दुर्बलता नष्ट होती है।

हल्दीः- आयुर्वेदाचार्यों ने हल्दी को रक्तशोधक, शोथहर, कफहर, वातहर, विषध्न, व्रण रोपक, त्वचा दोषहर गुणों से युक्त माना है। इसके प्रयोग से चर्मरोग, रक्तविकार, यकृत विकार, प्रतिश्याय, सर्दी, खांसी, प्रमेह, प्रदर रोग, अतिसार, संग्रहणी आदि में अत्यंत लाभ होता है। हल्दी में चूना मिलाकर लेप लगाने से पैरों की ऐंठन, सूजन, चोट, घाव, आदि में लाभ होता है। सांप एवं बिच्छू के दंश की वेदना को दूर करने के लिए हल्दी का धुआं लगाया जाता है। दूध में हल्दी के पाउडर को मिलाकर पिलाने से कफ विकार दूर होता है साथ ही अन्दरूनी चोट के दर्द को भी आराम मिलता है।

जीराः- इसके सेवन से भूख बढ़ती है और पेशाब साफ होता है। यह पाचन शक्ति को बढ़ाने वाला, वायु को निकालने वाला, उदर शूल को कम करके पतले दस्त को रोकने की गुणों से युक्त होता है। जीरा सुजाक, पथरी तथा मूत्रावरोध दोष नाशक होता है तथा गुड़ के साथ मिलाकर प्रयोग करने से पाचन क्रिया को सुधारता है। घी के साथ जीरे को मिलाकर लेने से हिचकी रुकती है तथा नींबू के साथ मिलाकर सेवन करने से स्त्रियों का वमन (गर्भवती की उल्टी) को रोकता है। प्रसूतावस्था में जीरे का उपयोग करने से दूध बढ़ता है तथा दही के साथ मिलाकर लेने से अतिसार एवं अनपच में लाभकर होता है।

मेथीः- आयुर्वेद के अनुसार मेथी दुग्धवर्द्धक, बलवर्द्धक, शोथहर, गर्भाशय संकोचक, भग (योनि) संकोचक, वातहर, मधुमेह हर आदि गुणों से युक्त होता है। खसरा (मसूरिका) तथा रक्तातिसार में मेथी को भूनकर फक्की के रूप में उपयोग करने से प्रसूता की भूख बढ़ती है। मधुमेह में मेथी के बीज का चूर्ण सेवन करने से लाभ होता है। त्वचा को मुलायम रखने के लिए मेथी को पीसकर लगाया जाता है। मेथी का उपयोग गलगण्ड, बच्चों के सूखा रोग, वातरक्त आदि को रोकने में भी किया जाता है। मेथी को कामशक्तिवर्द्धक भी माना जाता है।

कालीमिर्चः- इसका काढ़ा बनाकर कुल्ली करने से दांत दर्द ठीक हो जाता है। बिना पके हुए फोड़े, फुन्सियों पर मरीज को पीसकर लेप लगा देने से वे बैठ जाते हैं। प्याज, नमक और मरीच को पीसकर लगाने से सिर दर्द ठीक हो जाता है। इसका उत्तेजक प्रभाव मूत्र संस्थान पर पड़ता है जिससे मूत्र की मात्रा बढ़ जाती है।

इसका उपयोग पेट के फूलने, प्रवाहिका, अपचन तथा आमाशय की शिथिलता को दूर करने के लिए किया जाता है। मधु या घी के साथ इसके चूर्ण को मिलाकर सेवन करने से खांसी में लाभ होता है। मरीच से सिद्ध किया हुआ तेल त्वचा के विकार को नष्ट करता है तथा आमवात, गठिया, एवं खुजली को भी दूर करता है।

तेजपत्ताः- आयुर्वेद के अनुसार तेजपत्ता (तेजपत्र) में स्वेदजनन, वातहर एवं उत्तेजक गुण विद्यमान होते हैं। गर्भाशय की शिथिलता को दूर कर गर्भाधान में ंसहायक एवं गर्भस्राव को रोकने के गुणों से यह युक्त होता है। वात कफनाशक होने से इसके प्रयोग से मधुमेह में लाभ होता है तथा उदरशूल, पाचन विकार, अतिसार आदि विकारों में भी लाभदायक होता है। तेजपत्ता के चूर्ण को घी के साथ भूनकर मलाई में मिलाकर नित्य खाने से संकुचित योनि दोष दूर होता है। तेजपत्ता में अनेक मूत्रविकारों को दूर करने की अनुपम शक्ति होती है।

पूनम दिनकर(स्वास्थ्य दर्पण)

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