छुपायें नहीं, इलाज करायें अल्जीमर्स से ग्रसित परिजन का

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‘अब आपसे क्या छुपाना डॉ. साहब, रिटायरमेंट के पांच सालों बाद पापा इतने बदल गये हैं कि हमें सोचकर हैरत होती है। हरदम उदास रहने लगे हैं। न किसी से बात करना पसंद करते हैं, न ही किसी पर भरोसा करते हैं। अपने कपड़े भी बेढंगे से पहनते हैं। कभी-कभार कुछ अजीबोगरीब बातें सुनाई देने की चर्चा करते हैं। कहकर सविता ने मनोचिकित्सक की तरफ लाचारी भरी दृष्टि दौड़ाई।

परीक्षण के उपरांत सविता को डॉक्टर ने बताया कि उसके पिता अल्जीमर्स रोग से ग्रसित हो चुके हैं लेकिन समुचित चिकित्सा और पर्याप्त देखभाल के फलस्वरूप ऐसे रोगियों की हालत में सुधार होना संभव है।

सिर्फ सविता के पिता ही नहीं, पूरे विश्व में अल्जीमर्स रोग से ग्रसित रोगी पाये जाते हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि 1906 में डॉ. एलोइक अल्जीमर्स ने इस रोग की खोज की। उन्होंने एक वृद्ध मरीज के मस्तिष्क के भीतर की ऊपरी परत की स्नायु कोशिकाओं के तन्तुओं की गुत्थियों का परीक्षण करके पता लगाया कि वृद्धावस्था में होने वाले दृष्टि भ्रम, मति भ्रम, भुलक्कड़पन, उदासी व पागलपन के पीछे इन गुत्थियों की विकृति ही मूल कारण है।

सिर में लगी आंतरिक चोट, तेज बुखार, लंबे समय तक शरीर में पोषक तत्वों की न्यूनता, गंभीर सदमा, एसीटाइल कालिन न्यूरोट्रांसमीटर्स की मात्रा में कमी, एल्यूमीनियम धातु की शरीर में अत्यधिक मात्रा के पाए जाने से भी अल्जीमर्स रोग हो सकता है। ज्यादातर यह बीमारी 60 वर्ष से ऊपर लोगों में पायी जाती है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति अपने रोजमर्रा के कामों को भूलने लगता है। उसे नये लोगों व नयी जगहों के नाम याद रखने में परेशानी होने लगती है, उसे अपने कपडे़ (पोशाक) आदि ढंग से पहनने में असुविधा होने लगती है। उसमें शक, चिड़चिड़ापन और उदासी की भावना में बढ़ोत्तरी हो जाती है। उसमें दृष्टि भ्रम, मति भ्रम, विस्मृति वगैरह की समस्याएं भी पायी जाती हैं।

थोड़ा समय बीतने पर उसे पागलपन के दौरे भी पड़ने लगते हैं। इन लक्षणों के आधार पर रोगी के परिजनों को धैर्यपूर्वक रोगी को मनोचिकित्सक के पास ले जाकर इलाज करवाने से हिचकिचाना नहीं चाहिए। अक्सर अल्जीमर्स रोगी के परिजन उसे प्रारम्भिक अवस्था में मनोचिकित्सक के पास न ले जाकर, अन्य डॉक्टरों से इलाज करवाने की कोशिश करते हैं या कई बार झाड़फूंक करने वालों के चक्क्र में पड़ जाते हैं जबकि आधुनिक मनोचिकित्सकों के अनुसार, रोगी के परिजनों को उसे चिकित्सकीय सहायता दिलवाने के अलावा, उसे भरपूर ध्यान देना और आश्वस्त करना चाहिए।

जब वह एक ही बात बराबर दोहरायें या किसी पर बिना कारण ही शक जाहिर करें तो उसका बुरा न मानकर रोगी का ध्यान दूसरी खुशनुमा बातों की तरफ लगा देना चाहिये। इससे अल्जीमर्स के रोगियों की स्थिति में पर्याप्त सुधार होने लगता है और उनकी जिंदगी में भी रोशनी बिखरसकती है। पूर्णिमा मित्रा(स्वास्थ्य दर्पण)

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