स्कूलों में बढ़ती बुलिंग बच्चों की मानसिक सेहत पर डाल रही है गहरा असर

6 से 9 साल के बच्चे सबसे अधिक प्रभावित
सांकेतिक चित्र
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कोलकाता : स्कूलों में बढ़ती बुलिंग की घटनाएं बच्चों की मानसिक सेहत के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बार बार होने वाली शारीरिक, मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना के कारण बच्चे चिंता, अवसाद, डर, चिड़चिड़ाहट और पढ़ाई में मन न लगने जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। कई बच्चे पेट दर्द, सिरदर्द जैसी शारीरिक शिकायतें भी करने लगते हैं, जबकि जांच में कोई शारीरिक कारण नहीं मिलता। इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज, कोलकाता के चाइल्ड

एंड अडोलेसेंट साइकियाट्रिस्ट, डॉ. प्रवीन कुमार बताते हैं कि बुलिंग की पहचान तीन मुख्य तत्वों से होती है, शक्ति का अंतर, बार-बार दुर्व्यवहार और जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की भावना। सामान्य झगड़ों के विपरीत बुलिंग में एक बच्चा हमेशा कमजोर होता है और दूसरा हावी तथा प्रताड़ना लगातार जारी रहती है। कई अध्ययनों में पाया गया है कि बुलिंग आमतौर पर स्कूल ग्राउंड, वॉशरूम और क्लासरूम में जब शिक्षक मौजूद नहीं होते हैं तब बच्चे सबसे अधिक शिकार होते हैं। इसके साथ ही स्कूल बस भी बुलिंग का एक प्रमुख स्थान है।

तेजी से बढ़ रहे हैं साइबर बुलिंग के मामले हाल के वर्षों में साइबर बुलिंग के मामलों में भी तेजी आई है। सबसे अधिक प्रभावित आयु वर्ग में 6 से 9

साल के बच्चे हैं। डॉ. प्रवीन कुमार ने बताया कि जिन बच्चों में शारीरिक अंतर, विकास संबंधी कठिनाइयां, बोलने में समस्या, फिजिकल डिसएबिलिटी या जेंडर नॉन-कन्फॉर्मिटी हो, वे बुलिंग का अधिक शिकार बनते हैं। कई बच्चे डर या शर्म के कारण इस समस्या की जानकारी माता-पिता या शिक्षकों को नहीं दे पाते जिससे मामला लंबे समय तक दबा रहता है और मानसिक तनाव बढ़ता जाता है।

स्कूल में क्या कदम उठाए जाएं?: बुलिंग को रोकने के लिए स्कूलों में स्पष्ट नियम और सख्त मॉनिटरिंग की जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार कक्षा स्तर पर यह नियम निर्धारित होने चाहिए कि कोई छात्र किसी का मजाक नहीं उड़ाएगा और यदि किसी बच्चे को तंग

किया जाता दिखे तो तुरंत शिक्षक को जानकारी दी जाएगी। वॉशरूम, ग्राउंड और स्कूल बस जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने की आवश्यकता है। बुलिंग करने वाले बच्चों के लिए केवल दंड नहीं, बल्कि काउंसलिंग, एंगर मैनेजमेंट और सोशल स्किल ट्रेनिंग अनिवार्य बताई गई है। वहीं पीड़ित बच्चों को भावनात्मक सहारा, स्कूल काउंसलर की मदद और परिवार से मजबूत समर्थन की जरूरत होती है ताकि वे मानसिक आघात से उबर सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि बुलिंग को सामान्य बचपन की बात समझकर नजरअंदाज करना बेहद खतरनाक हो सकता है। यह बच्चों के आत्मविश्वास, मानसिक विकास और सामाजिक व्यवहार पर दीर्घकालिक असर छोड़ती है।

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