आम लोगों से कम हो रही डॉक्टरों की औसत उम्र!

ऑर्थोपेडिक सर्जनों पर रेडिएशन और काम के दबाव का खतरा
सांकेतिक चित्र
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मधुर, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : आम लोगों की तुलना में डॉक्टरों की औसत जीवन प्रत्याशा कम होने का मामला सामने आया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के एक सर्वे के हवाले से बताया गया है कि जहां आम लोगों की औसत आयु करीब 72.3 वर्ष है, वहीं डॉक्टरों की औसत उम्र लगभग 64 से 67 वर्ष के बीच बताई गई है। अलग-अलग चिकित्सा शाखाओं में ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों की स्थिति और चिंताजनक बताई गई है। वेस्ट बंगाल ऑर्थोपेडिक एसोसिएशन की ओर से आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में विशेषज्ञों ने ऑर्थोपेडिक सर्जनों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले पेशागत खतरों को लेकर चिंता जताई। एसोसिएशन के अध्यक्ष और एनआरएस मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के ऑर्थोपेडिक विभाग के प्रो. (डॉ.) किरण कुमार मुखोपाध्याय ने बताया कि ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों की औसत उम्र फिलहाल करीब 60 वर्ष के आसपास बताई जा रही है।

सी-आर्म मशीन से निकलने वाला विकिरण चिंता का कारण

विशेषज्ञों के मुताबिक ऑर्थोपेडिक सर्जरी में सी-आर्म मशीन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। हड्डियों के फ्रैक्चर में स्क्रू लगाने, हड्डी को सही जगह स्थापित करने और रीढ़ की सर्जरी जैसी प्रक्रियाओं के दौरान यह मशीन डॉक्टरों को ऑपरेशन की स्थिति देखने में मदद करती है। सी-आर्म मशीन से एक्स-रे प्रकार का रेडिएशन निकलता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक और बार-बार इस रेडिएशन के संपर्क में रहने से डॉक्टरों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का खतरा रहता है। डॉ. किरण कुमार मुखोपाध्याय ने बताया कि लंबे समय तक रेडिएशन के संपर्क में रहने से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है, जिसमें कैंसर की आशंका भी शामिल है।

आंखों और हाथों पर ज्यादा असर

विशेषज्ञों ने बताया कि सी-आर्म से निकलने वाले रेडिएशन के संपर्क में ऑर्थोपेडिक सर्जनों के हाथ और आंखें विशेष रूप से आते हैं। इन्हें संभावित रूप से संवेदनशील माना जाता है। ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. उत्पल बंद्योपाध्याय ने बताया कि बड़ी संख्या में डॉक्टर आंखों से जुड़ी समस्याओं के इलाज के लिए दक्षिण भारत के अस्पतालों का रुख करते हैं और इनमें ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों की संख्या भी काफी है। लंबे समय तक सी-आर्म मशीन के साथ काम करने के कारण आंख की मैक्युला यानी रेटिना के केंद्रीय हिस्से पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। इसके अलावा समय से पहले मोतियाबिंद होने का जोखिम भी बढ़ सकता है।

मरीजों का दबाव और अनियमित जीवनशैली भी बड़ी वजह

सिर्फ रेडिएशन ही नहीं, बल्कि डॉक्टरों की अनियमित जीवनशैली और लगातार काम का दबाव भी उनके स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार बंगाल में एक डॉक्टर के जिम्मे मरीजों की संख्या काफी अधिक होती है। लंबे समय तक लगातार काम करने के कारण पर्याप्त आराम और नींद नहीं मिल पाती। डॉ. उत्पल बंद्योपाध्याय ने बताया कि डॉक्टरों का जीवन अक्सर बेहद अनियमित रहता है। पर्याप्त आराम नहीं मिलने के कारण तनाव और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं।

ऑर्थोपेडिक सर्जनों के लिए सुरक्षा उपाय जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि ऑपरेशन के दौरान सी-आर्म मशीन का इस्तेमाल कई मामलों में जरूरी है, लेकिन लंबे समय तक रेडिएशन के संपर्क से बचने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों पर ध्यान देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञों के स्वास्थ्य को देखते हुए नियमित स्वास्थ्य जांच, रेडिएशन से बचाव के उपाय और काम के दौरान उचित विश्राम की व्यवस्था पर जोर देने की जरूरत है। विशेषज्ञों के मुताबिक मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टरों के स्वास्थ्य की सुरक्षा भी चिकित्सा व्यवस्था का अहम हिस्सा होनी चाहिए।

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