H1N1 से छह साल की बच्ची को हुआ एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस

कोलकाता के डॉक्टरों ने बचाई जान
सांकेतिक तस्वीर
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मधुर, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : आमतौर पर एच1एन1 यानी स्वाइन फ्लू को श्वसन तंत्र को प्रभावित करने वाली बीमारी माना जाता है, लेकिन झारखंड की छह वर्षीय बच्ची में इस वायरस ने पैंक्रियाज को प्रभावित कर दिया। बच्ची को एच1एन1 संक्रमण के कारण गंभीर एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस हुआ और इसके साथ मैक्रोफेज एक्टिवेशन सिंड्रोम जैसी जानलेवा हाइपर-इन्फ्लेमेटरी स्थिति भी विकसित हो गई। कोलकाता के पीयरलेस अस्पताल में समय रहते इलाज मिलने से बच्ची पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौट गई। जानकारी के मुताबिक, बच्ची को करीब दो सप्ताह से तेज बुखार था। उसका इलाज झारखंड के एक अस्पताल में चल रहा था। हालत बिगड़ने पर परिजन 31 जुलाई को उसे कोलकाता के पीयरलेस अस्पताल लेकर पहुंचे। बच्ची को गंभीर स्थिति में पीडियाट्रिक आईसीयू में भर्ती किया गया। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.सहेली दासगुप्ता की निगरानी में हुई जांच में इन्फ्लुएंजा संक्रमण की पुष्टि हुई। बच्ची को सांस लेने में भी परेशानी थी और बुखार लगातार बना हुआ था। डॉक्टरों को जांच रिपोर्ट और लगातार बने रहने वाले तेज बुखार के आधार पर शरीर में अत्यधिक सूजन और इम्यून सिस्टम के असामान्य रूप से सक्रिय होने का संदेह हुआ। डॉक्टरों के अनुसार, बच्ची में मैक्रोफेज एक्टिवेशन सिंड्रोम विकसित हो गया था। यह एक गंभीर हाइपर-इन्फ्लेमेटरी स्थिति है, जिसमें शरीर में अत्यधिक मात्रा में साइटोकाइन्स बनने से कई अंगों के काम करने में बाधा आ सकती है। समय पर इलाज नहीं मिलने पर यह मल्टी-ऑर्गन फेल्योर तक पहुंच सकती है।

H1N1 से पैंक्रियाटाइटिस होना बेहद दुर्लभ

विशेषज्ञों के मुताबिक, इन्फ्लुएंजा के कारण एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस होना दुर्लभ है। एच1एन1 मुख्य रूप से फेफड़ों और श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है, लेकिन कुछ मामलों में वायरस अग्नाशय की कोशिकाओं को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे उसमें अचानक सूजन और गंभीर पैंक्रियाटाइटिस हो सकता है।

इलाज में कई स्तरों पर की गई कोशिश

बच्ची को पांच दिनों तक सांस लेने में सहायता के लिए हाई-फ्लो नेजल कैनुला दिया गया। इसके अलावा उसे ओरल ओसेल्टामिविर, दो दिनों तक हाई-डोज इंट्रावेनस इम्युनोग्लोबुलिन, पर्याप्त हाइड्रेशन और शुरुआती एंटरल फीडिंग दी गई। डॉक्टरों ने बताया कि एक्यूट पैंक्रियाटाइटिस में शुरुआती फीडिंग महत्वपूर्ण होती है और इससे बैक्टीरियल ट्रांसलोकेशन के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। समय पर बीमारी की पहचान और उपचार शुरू होने से बच्ची के पैंक्रियाज को गंभीर नुकसान से बचा लिया गया। वह करीब 12 दिनों तक पीआईसीयू में इलाज के बाद ठीक हुई और अब अपने परिवार के साथ झारखंड स्थित घर लौट चुकी है। डॉक्टरों के मुताबिक, यह मामला इस बात की अहम याद दिलाता है कि एच1एन1 संक्रमण के दौरान यदि तेज बुखार लंबे समय तक बना रहे और उसके साथ पेट में तेज दर्द जैसे असामान्य लक्षण दिखाई दें, तो केवल श्वसन संबंधी जटिलताओं के बजाय शरीर के दूसरे अंगों के प्रभावित होने की संभावना पर भी ध्यान देना जरूरी है।

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