

मातृत्व का सुख पाने के लिए नारी को बहुत कठिन समस्याओं से गुजरना होता है। मातृत्व सुख का प्रथम चरण गर्भावस्था को माना जाता है क्योंकि औरत जब स्त्रीत्व से मातृत्व की इस अवस्था में पहुंचती है तो उसमें अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक परिवर्तन होने लगते हैं और वह सुखद कल्पनाओं में खो सी जाती है। गर्भावस्था स्त्री के लिए एक बड़ी ही नाजुक अवस्था होती है जिसमें उसे बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है। इस अवस्था में स्त्री को अपने साथ-साथ गर्भस्थ शिशु का भी ध्यान रखना होता है। गर्भावस्था में आते ही स्त्रियों को मुख्य रूप से जिन परेशानियों का सामना करना पड़ता है, उनके विषय में यहां बताया जा रहा है ताकि थोड़ी-सी चेतनता से, मुसीबतों से बचकर स्वस्थ व सुन्दर शिशु को जन्म दिया जा सके।
उलटियां-
मासिक स्राव बंद हो जाने के प्रायः दो-तीन सप्ताह बाद से ही गर्भवती स्त्री को मिचली या कै होनी शुरू हो जाती है। यह सिलसिला तीन माह तक चलता रहता है। यह बात अलग है कि कुछ स्त्रियों को मिचली और कै अधिक होती है तो कुछ को कम। प्रायः प्रथम बार गर्भवती होने वाली स्त्री में यह प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है।
उल्टियों की यह प्रवृत्ति प्रातः काल अधिक पायी जाती है। वमन की प्रवृत्ति कम या सामान्य होने पर किसी प्रकार के विशेष उपचार की आवश्यकता नहीं होती। सुबह खाली पेट चाय या दूध का सेवन नहीं करना चाहिए। हल्का नाश्ता करने के बाद ही गरम तरल पदार्थों का सेवन करना हितकर होता है। नाश्ता करने के बाद कम से कम आधा घंटा बिस्तर पर लेट जाने से मिचली नहीं आती।
अत्यधिक उल्टियां होने पर गुलकंद और मक्खन बराबर-बराबर, मात्रा में मिलाकर 10-10 ग्राम सुबह-शाम चाटकर खाने से जी नहीं मिचलाता तथा शरीर को बल भी मिलता है। अनार का रस चूसना, डाब (नारियल) का पानी पीना, नींबू को बीच से काट उस पर काली मिर्च का चूर्ण तथा नमक डालकर आग पर पकाकर चूसने पर भी उलटियां नहीं आती।
कब्ज :-
गर्भिणी को अक्सर कब्ज की शिकायत हो जाया करती है। खान-पान पर ध्यान देकर उचित निराकरण किया जा सकता है। गर्भ की अवस्था में तीव्र विरेचक अर्थात् अत्यंत प्रभावशाली दस्तकारक औषधियों का व्यवहार नहीं करना चाहिए। इससे गर्भपात (गर्भस्राव) तक हो सकता है। भोजन में हरी शाक-सब्जियां, ताजे रेशेयुक्त फल, चोकरयुक्त आटे की रोटी आदि का सेवन करना तथा सुबह खुली हवा में टहलना कब्ज को नहीं होने देता। रात में सोते समय गुनगुने दूध के साथ गुलकंद 10 से 20 ग्राम या हरड़ का मुरब्बा 1-2 नग लेने से प्रातः दस्त साफ आता है। ईसबगोल की भूसी का प्रयोग तथा लवणभास्कर चूर्ण का प्रयोग भी कब्ज को दूर रखता है तथा पेट में गैस नहीं बनने देता। गर्भावस्था के समय गैस भी अधिक बननी प्रारंभ हो जाती है।
बार-बार मूत्र का त्यागः-
गर्भाधान हो जाने के बाद ही स्त्री को बार-बार पेशाब आने लगता है। यह कोई रोग या विकार नहीं होता। चिकित्सक से यह जांच करवाकर सुनिश्चित हो जाना चाहिए कि यह शिकायत बहुमूत्र या मधुमेह के कारण तो नहीं है? अगर ऐसी बात न हो और मात्रा गर्भ की गर्मी के कारण ही बार-बार पेशाब हो रहा हो तो गुलाबजल या पुदीने का शरबत पीने से यह ठीक हो जाता है।
मधुमेहः-
गर्भावस्था में अत्यधिक मूत्र त्याग, अत्यधिक प्यास, अत्यधिक भूख, दुर्बलता, योनि में खुजली आदि मधुमेह के भी लक्षण हो सकते हैं। गर्भावस्था का मधुमेह अत्यंत भयंकर हो सकता है, अतः समय-समय पर रक्त शर्करा की जांच अवश्य कराते रहना चाहिए। बसंत कुसुमाकर रस, चन्द्रप्रभावटी, प्रमेहदभांकुश रस, त्रिबंगशिला, मधुनाश,मधुमेहारि आदि अनेक आयुर्वेदिक औषधियां हैं जिनका प्रयोग डाॅक्टर की सलाह से मधुमेह में लाभान्वित हुआ जा सकता है।
रक्ताल्पताः-
गर्भवती स्त्रियों में प्रायः खून की कमी पायी जाती है। गर्भ में पल रहे शिशु का भरण-पोषण माता के रक्त से होता है अतः गर्भावस्था में पौष्टिक एवं रक्तवर्द्धक आहार की अत्यधिक आवश्यकता पड़ती है जिसके अभाव में स्त्री रक्ताल्पता का शिकार हो जाती है। इससे बचने के लिए पौष्टिक एवं रक्तवर्द्धक आहार ग्रहण करना चाहिए। सुबह-शाम एक-एक नग आंवला का मुरब्बा तथा दोपहर के भोजन के बाद 2-3 पके केले लेने से रक्ताल्पता का खतरा नहीं रहता। आयुर्वेद में लोहासव आदि औषधियां रक्ताल्पता की उत्तम औषधि मानी जाती हैं।
सूजन :-
गर्भावस्था के अन्तिम दिनों में किसी-किसी स्त्री के पावों में सूजन आ जाती है। सूजन वाला स्थान नरम एवं पिलपिला होता है। वहां अंगुली से दबाने से प्रायः गड्ढ़ा सा हो जाता है। जांच करवाकर यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि कहीं यह सूजन हृदयरोग, वृक्करोग या यकृतरोग के कारण तो नहीं है। गर्भाशय के दबाव से होने वाली यह सूजन प्रसव के बाद स्वयं ही ठीक हो जाती है।
पेट पर सफेद धारियां :-
इसे किक्किस रोग के नाम से जाना जाता है। गर्भावस्था में नियमित रूप से सरसों के तेल से पेट पर मालिश करते रहने से ये धारियां नहीं रहती। खुजली होने पर किसी मुलायम कपड़े से सहलाते रहना चाहिये। नाखून न लगने पाये, इसका ध्यान रखना आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त गर्भावस्था में श्वेतप्रदर, खांसी, भूख की कमी, योनि की खुजली, वृक्कशोथ, उच्च रक्तचाप, अर्श अम्लपित्त आदि की शिकायतें भी गर्भावस्था में हो जाया करती हैं। गर्भधारण के उपरान्त हमेशा चिकित्सक के संपर्क में रहना चाहिए। इस अवस्था में स्वयं को तनावों से मुक्त रखना, शारीरिक परिश्रम करते रहना तथा किसी न किसी काम में स्वयं को लगाये रखना चाहिए। (उर्वशी)