

उम्रदराज लोगों में वेरिकोस वेन्स की समस्या आम है जबकि 20 साल से कम उम्र के लोगों में यह इक्का-दुक्का मामलों में ही दिखाई देती है। पुरुषों की बनिस्बत महिलाओं में यह समस्या ज्यादा आम है। यह समस्या पीढ़ी दर पीढ़ी भी चल सकती है। गर्भावस्था में महिलाओं में इसके होने की आशंका अधिक रहती है। इसके अलावा शरीर का वजन ज्यादा होने और ज्यादा देर तक खड़े रहकर यात्रा या काम करने से भी वेरिकोस वेन्स के पनपने का खतरा रहता है। हाई ब्लडप्रेशर, कब्जियत और डायबिटिज आदि भी इस समस्या के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। वेरिकोस वेन्स से परेशानी तो हो सकती है लेकिन आमतौर पर इससे कोई गंभीर समस्या नहीं पनपती।
वेरिकोस वेन्स से खासतौर से टांगें प्रभावित होती हैं। इसमें त्वचा के ठीक नीचे स्थित नसों में खून इकट्ठा होता है। ये नसें छिद्रिल (सुराख युक्त) नसों के जरिए गहराई में स्थित उन नसों में अपना खून खाली करती हैं जिनके जरिए खून फिर हृदय में जाता है। टांगों की पेशियों में होने वाले संकुचन से खून को ऊपर हृदय की ओर पहुंचने में मदद मिलती है। यहां तक कि जब आप बड़े होते हैं तब भी खून हृदय की ओर पंप करने की प्रक्रिया चलती रहती है।
नसों में वन वे वाल्व होते हैं जो हृदय की ओर पंप किए गए खून को वापस पैरों में आने से रोकते हैं। छिद्रिल नसों में मौजूद ये वाल्व जब ठीक तरह से बंद नहीं होते तो खून उन नसों में वापस आ जाता है जो त्वचा के ठीक नीचे स्थित होती हैं। खून की वापसी के कारण टांग की सतही नसों पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे नसें फूल जाती हैं या मुड़ जाती है। इसे ही वेरिकोस वेंस कहते हैं। सही समय पर यदि इस समस्या का उचित इलाज न किया जाए तो अक्सर स्थिति खराब होने लगती है।
क्रॉनिक लीवर डिजीज के कॉम्प्लीकेशन के कारण शरीर के दूसरे हिस्सों में भी वेरिकोस वेंस की समस्या पनप सकती है जो पोर्टल वेंस में खून का दबाव बढ़ती है। ब्लडप्रेशर बढ़ने की वजह से ग्रास नली के निचले आखिरी हिस्से और कभी कभार गुदाद्वार के आसपास की नसें फूल जाती हैं।
आनुवंशिक तौर पर नसों के वाल्स कमजोर होने के कारण भी यह समस्या हो सकती है। महिला हार्मोन प्रोजेस्टेरान के प्रभाव से नसें फैल जाती हैं। हार्मोन का यह प्रभाव वेरिकोस वेंस की समस्या पनपाने के लिए नसों को उकसाता है। यह समस्या आमतौर पर गर्भवती महिलाओं में देखी जाती है। इसके अलावा गर्भावस्था में गर्भाशय धीरे-धीरे बढ़ने के कारण भी पेडू की नसों पर दबाव पड़ता है।
त्वचा पर आसानी से दिखने वाली, नीली, सूजी तथा मुड़ी हुई नसें जो खड़ा होने पर ज्यादा फूल जाती हैं।
प्रभावित टांग में दर्द होता है, खासतौर से देर तक खड़े रहने पर।
गंभीर मामलों में वेरिकोस वेंस के ऊपर की त्वचा पतली व ड्राई हो जाती है और वहां खुजली होने लगती है। अक्सर ऐसा टखने पर होता है। ज्यादा खुजलाने पर वहां घाव (अल्सर) हो सकता है।
डाक्टर मरीज को खड़ा होने को कहता है। खड़े होने पर नस साफ नजर आने लगती है। जरूरत होने पर डाॅक्टर डाप्लर, अल्ट्रासाउंड व स्कैनिंग भी कर सकते हैं ताकि मकड़ी के जाले की तरह टांग में फैली नसों में खून के बहाव की दिशा निर्धारित कर सके। यदि मामला वेरिकोस वेंस का होगा तो खून का बहाव पीछे की ओर यानी उल्टा होगा।
लगातार ज्यादा देर तक खड़े न रहें । यदि संभव हो तो बैठने के समय अपनी टांगें ऊंची रखें। इसके लिए प्रत्येक तीन घंटे पर 10 मिनट का ब्रेक लें और अपनी टांगों को हृदय से ज्यादा ऊंचाई तक उठाएं। ऐसा करने से नसों के वाल्व पर प्रेशर पड़ता है और उन्हें मजबूत बनने का मौका मिलता है। यदि ऐसा करना संभव न हो तो रात को सोते वक्त 6 से 10 इंच की ऊंचाई पर अपनी टांगें रखें। ऊंचाई बढ़ाने के लिए तकिए या गद्दे का इस्तेमाल कर सकते हैं।
नियमित रूप से पैदल चलें, ताकि टांगों की पेशियों की कसरत हो और खून का संचार सुचारु रूप से होता रहे।
ऐसे चुस्त कपड़े न पहनें जो टांगों में खून के बहाव में रुकावट डालते हों।
यदि आप ओवरवेट हैं तो अपना वजन कम करें।
एंटी आक्सीडेंट्स युक्त फल और सब्जियों का इस्तेमाल अधिक करें। जितनी रंग बिरंगी सब्जियां और फल होंगे, उतने ही ज्यादा एंटी आक्सीडेंट मिलेंगे। फल और सब्जियों में बायोफ्लेवेनाइड्स पाए जाते हैं जो नसों को ताकतवर बनाते हैं।
अनन्नास में पाया जाने वाला ब्रोमेलेन नामक तत्व प्रोटीन को घुलनशील बनाने वाला एंजाइम है। गोली के रूप में उपलब्ध यह तत्व वेरिकोस वेंस के कारण उत्पन्न सूजन और दर्द को कम कर सकता है।
नरेंद्र देवांगन (स्वास्थ्य दर्पण)