

हिरण जब चौकड़ी भरकर दौड़ता है-उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता । मन में सोचता है कि संसार में सबसे तेज दौडऩे वाला जानवर वह ही है। उसका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। कहते हैं कि हिरण 70 किलोमीटर की तेज रफ्तार से चौकड़ी लगाता है परन्तु जब दुनिया में सबसे तेज दौड़ने वाले चीते से उसका सामना हो जाता है तब तक सारी चौकड़ी भूल जाता है।
उसका शरीर चीते को देखते ही ठण्डा पड़ने लगता है-हौसला जवाब देने लगता है। हिरण की सांसें थम जाती हैं और चीता पलक झपकते ही उसकी इह लीला समाप्त कर देता है। जो हिरण अपने आप पर गर्व कर रहा था, जमीन पर पड़ा तड़प रहा होता है, मन में यह पछतावा लिए कि उसने वास्तविकता से आंखें मूंद ली थी।
यही हाल चीते का भी होता है जब वह शिकारियों के हाथ लग जाता है। चीते को मारने का वर्जित कानून होने पर भी बन्दूक की गोली चीते की भी चौकड़ी भुला देती है। उसका यह घमण्ड टूट जाता है कि वह दुनिया का सबसे तेज चौकड़ी वाला जानवर है।
यही हाल इंसान का है। अनेक ऐसे अवसर आते हैं जब अपने को तीसमारखां समझने वाला बिल्ली की तरह मिमियाने लगता है। शक्ति सम्पन्न, धन सम्पन्न को जब यह घमण्ड होने लगता है कि उसके बराबर कोई है ही नहीं, तब वह यह नहीं समझता कि वह प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल सोच रहा है। दुनिया में ऐसा उदाहरण कोई नहीं है जिससे यह सिद्ध हो कि अपने को सबसे बड़ा समझने वाले का मस्तक न झुका हो।
कार्य क्षेत्र में काम करने वाले कई व्यक्ति मालिक को कुछ नहीं समझते। वे स्वयं को मालिक समझने की कल्पना करने लगते हैं। मालिक को नीचा दिखाने में वे अपनी शान समझते हैं पर जरा ध्यान दें-पूरी दुनिया में जितने भी मालिक व कर्मचारी के एग्रीमेन्ट हैं, सभी शर्तें कर्मचारी के पक्ष की हैं पर एक शर्त मालिक के पक्ष की है, वह है उसे ट्रांसफर करने की। मालिक उस कर्मचारी के प्रति जब उस शर्त का प्रयोग करता है तो कर्मचारी भूल जाता है अपनी चौकड़ी।
यही हाल मनुष्य का भी है। वह धन वैभव एवं शक्ति सम्पन्न होने पर भगवान को कुछ नहीं समझता परन्तु भूल जाता है कि भगवान से समझौते के समय यही एक शर्त एग्रीमेन्ट के समय की है। किसी भी समय जब भगवान इस शर्त का उपयोग करते हैं एवं एक परिवार से दूसरे परिवार में ट्रांसफर का अनायास आदेश देते हैं वह भूल जाता है अपनी चौकड़ी।
मालिक और भगवान के पास एक अलिखित पावर है और वह है-उससे काम की पावर छीन लेना। मालिक उसके पास से सब काम हटा देता है। समय पर जाओ, अपनी जगह पर बैठो, सभी सुविधाओं का लाभ उठाओ पर कोई काम मत करो। ऐसे में उनका जीवन दूभर हो जाता है।
यही पावर परमात्मा के हाथ में है। दुर्घटना या किसी बीमारी के कारण मनुष्य शरीर से लाचार हो जाता है। बेड पर पड़ा रहता है। हाथ पैर से काम नहीं ले सकता हालांकि टी.वी., इंटरनेट नर्स, चिकित्सा की सभी सुविधायें उपलब्ध हो रही हैं। उसका जीवन नरक तुल्य हो जाता है और भूल जाता है चौकड़ी।
जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब अपने हुए पराये की नौबत आती है। व्यापार में अपना विश्वासी पार्टनर बेईमानी और धोखाधड़ी से धन हड़प जाता है। परिवार के सदस्यों की नीयत खराब हो जाती है। ऐसी हालत में कल तक जो चौकड़ी भरकर चलता था, वही भूल जाता है चौकड़ी भरना।
कारोबार बहुत अच्छी तरह जोर-शोर से चल रहा है। किसी कारण सरकार की नजर पड़ गई। इन्कम टैक्स, सेल्स टैक्स की रेड पड़ गई। उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर लिया गया, किसी भी गैरकानूनी काम में फंसवा दिया गया, कोई नया अध्यादेश आ गया, बजट की मार पड़ गई, उद्योग धंधे में अनिश्चित कालीन हड़ताल हो गई आदि से वह अपने को सम्भाल नहीं पाया और भूल जाता है चौकड़ी।
प्रकृति की मार भूकम्प, सुनामी, अग्निकाण्ड आदि की मार भी भुला देती है बड़े-बड़ों की चौकड़ी।
आजकल गुण्डे, बदमाश, दादा, डॉन, बाहुबली एवं माफिया की नजर भी अच्छे-अच्छों के हौसले पस्त कर देती है और भुला देती है चौकड़ी भरना।
चुनाव में हार राजनेताओं के लिए अभिशाप है। हार होते ही सभी सहयोगी जीतने वालों की तरफ चले जाते हैं और वह राजनेता रह जाता है अकेला।
जीवन में उतार-चढ़ाव आयेंगे ही। मन में ऐसे विचार नहीं उठने चाहिये कि वह सर्व-समर्थ है। सबसे ऊंचा है परमात्मा। परमात्मा से यही प्रार्थना करनी चाहिये कि हिरण की तरह उसके मन में सबसे तेज रफ्तार से चलने वाले की भावना न आये वरना हिरण की तरह भूल जायेगा चौकड़ी भरना। (उर्वशी)