जब कपड़े धोने के लिए उन्हें वाशिंग मशीन में डाला जाता है तो सबसे पहले
उन्हें पानी में डुबोया जाता है। फिर उसमें रासायनिक पदार्थों से निर्मित
डिटर्जेंट पाउडर या लिक्विड डाला जाता है। उसके बाद वाशिंग मशीन कपड़ों
की रगड़ाई करती है। कभी उन्हें दाएं फेंकती है तो कभी बाएं फेंकती है। जब
तक मशीन चलती रहती है कपड़े जैसे एक भंवर में फंसकर नाचते रहने के
लिए विवश हो जाते हैं। उसके बाद डिटर्जेंट वाला पानी निकालकर उन्हें साफ
पानी में भी कई बार खंगाला जाता है और अंत में निचोड़ने का कार्य संपन्न
किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद ही कपड़े दाग-धब्बों, चिकनाई व
मैल से रहित व साफ-सुथरे होकर बाहर आते हैं।
हमारे जीवन में विषम परिस्थितियां भी एक वाशिंग मशीन की तरह ही कार्य
करती हैं। हम इन विषम परिस्थितियों से गुजरते हुए हर तरह से एक बेहतर
इंसान के रूप में बाहर निकलते हैं। जैसे धातु के बर्तनों पर राख अथवा
मिट्टी रगड़ने से वे चमकने लगते हैं, उसी तरह से संघर्षों में पला व उनसे
जूझता हुआ व्यक्ति भी चमकने लगता है। उसके मुखमंडल पर एक तेज
व्याप्त हो जाता है। उसका आत्मविश्वास बढ़ जाता है जिससे वो पहले जिन
परिस्थितियों का सामना करने से डरता था अब उनका मुकाबला करने में उसे
डर नहीं लगता। जो काम उसे पर्वत के समान विशाल लगते थे अब राई के
समान साधारण लगने लगते हैं। यही परिस्थितियां तो व्यक्ति के लिए
उन्नति का मार्ग खोलती हैं।
जिस प्रकार से सोना अग्नि में तपने पर शुद्ध हो जाता है, उसमें मिली हुई
अशुद्धियां जलकर अलग या नष्ट हो जाती हैं उसी प्रकार से विषम
परिस्थितियों में अथवा उनसे उत्पन्न संघर्ष के दौरान व्यक्ति अपनी कमियों
व दोषों से मुक्त हो जाता है। उसे पता चल जाता है कि वो अपनी किन
कमियों अथवा दोषों के कारण पिछड़ गया था। वह उन्हें समझकर दूर करने
का प्रयास करता है। विषम परिस्थितियों से बाहर निकलने का एकमात्र यही
उपचार होता है और विषम परिस्थितियों के कारण ही वो उन्हें दूर कर पाता
है।
ये विषम परिस्थितियां ही होती हैं जो मनुष्य में धैर्य का विकास करती हैं,
उसे सहनशील बनाती हैं। विषम परिस्थितियों में ही व्यक्ति दूसरों से सहयोग
व मार्गदर्शन लेने व देने की योग्यता भी विकसित कर पाता है। जो लोग
कभी विषम परिस्थितियों से नहीं गुजरते, वे दूसरों का दु:ख-दर्द भी नहीं
समझ सकते। ऐसे में दूसरों की मदद करने की भावना का विकास भी नहीं
हो पाता।
विषम परिस्थितियां जीवन को नए आयाम प्रदान करने में सक्षम होती हैं।
विषम परिस्थितियां उत्पन्न होने के कारण ही हमारी प्रसुप्त शक्तियां जागृत
हो उठती हैं। हमें सामान्यतः यह पता ही नहीं होता कि हममें कितनी शक्ति
है अथवा हम क्या-क्या कार्य कर सकते हैं? विषम परिस्थितियां ही हमें
हमारी शक्ति अथवा क्षमता से अवगत कराने में सक्षम होती हैं। ये विषम
परिस्थितियां ही हैं जो हमारे सामने असीम संभावनाओं के द्वार खोल देती
हैं। ऐसे में ही हम नए रास्तों की तलाश में जी-जान से जुट जाते हैं।
सामान्य परिस्थितियों में हम कब नए रास्ते तलाशने का जोखिम उठाते हैं?
जीवन में जितनी अधिक विषम परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं, हम उतना ही
अधिक संघर्ष करते हैं और उतना ही अधिक आगे बढ़ते हैं। आशा गुप्ता(उर्वशी)

