

राजस्थान अपनी समृद्ध स्थापत्य कला, ऐतिहासिक धरोहरों और रंग-बिरंगी लोक संस्कृति के लिए पूरे देश में विशिष्ट पहचान रखता है। यहां के किले, मंदिर, हवेलियां और लोक परंपराएं जितनी प्रसिद्ध हैं, उतना ही महत्व यहां लगने वाले मेलों का भी है। राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में वर्ष भर अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक मेले आयोजित होते हैं जो केवल आस्था के केंद्र ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन और लोक संस्कृति के जीवंत उत्सव भी होते हैं। इन्हीं मेलों में हनुमानगढ़ जिले में लगने वाला भद्रकाली मेला विशेष महत्व रखता है।
हनुमानगढ़ जिले में मां भद्रकाली का ऐतिहासिक मंदिर क्षेत्र की लोक आस्था का केंद्र है। नवरात्रों में यहां लगने वाला मेला सवा सौ साल से अधिक पुरानी परंपरा का जीवंत प्रतीक है जिसमें हर वर्ष हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। हनुमानगढ़ टाउन से लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित मां भद्रकाली का ऐतिहासिक मंदिर इस मेले का मुख्य केंद्र है। यहां नवरात्रों के दौरान मेला भरता है। वैसे तो नवरात्रा स्थापना के साथ ही मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आगमन आरंभ हो जाता है लेकिन चैत्र सुदी अष्टमी और नवमी को दो दिनों के विशाल मेला में तो हजारों लोग उमड़ते हैं । लोकशक्ति की प्रतीक मां भद्रकाली के दर्शन के लिए वैसे तो पूरे वर्ष श्रद्धालु यहां आते रहते हैं लेकिन इन विशेष तिथियों पर श्रद्धालुओं की भीड़ कई गुना बढ़ जाती है। आसपास के गांवों और कस्बों के अलावा पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा से भी हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।
हर ओर ‘मां भद्रकाली की जय’ और ‘काली माता की जय’ के जयकारे गूंजते रहते हैं। लंबी कतारों में जुटे श्रद्धालु घंटों खड़े रहकर मंदिर तक पहुंचते हैं, जहां वे अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के चरणों में माथा टेकते हैं। लोक मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है।
मेले के दौरान आम दिनों में शांत और वीरान रहने वाला यह क्षेत्र चहल-पहल से भर उठता है। बड़ी संख्या में सजी दुकानों, खिलौनों और घरेलू वस्तुओं की बिक्री करने वाले फेरीवालों, बच्चों के झूलों और रंग-बिरंगे परिधानों में सजे लोगों की भीड़ इस स्थान को एक बड़े उत्सव स्थल में बदल देती है। हर ओर ‘मां भद्रकाली की जय’ और ‘काली माता की जय’ के जयकारे गूंजते रहते हैं। लंबी कतारों में जुटे श्रद्धालु घंटों खड़े रहकर मंदिर तक पहुंचते हैं, जहां वे अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के चरणों में माथा टेकते हैं। लोक मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है।
यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
भद्रकाली का यह मेला सवा सौ वर्ष से भी अधिक समय से लगातार आयोजित होता आ रहा है। समय के साथ इसकी लोकप्रियता और श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती रही है। यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। मेले में आने वाले लोगों के लिए यह आस्था के साथ-साथ मेलजोल और आनंद का अवसर भी होता है।
मंदिर की स्थापना को लेकर भी कई जन श्रुतियां प्रचलित हैं। माना जाता है कि यह मंदिर मुगल सम्राट अकबर के समय का है और इसकी स्थापना बीकानेर रियासत के छठे महाराजा राम सिंह ने करवाई थी। मंदिर की स्थापत्य शैली भी इसे विशिष्ट बनाती है। इसकी बनावट अन्य काली मंदिरों से अलग दिखाई देती है। मंदिर उस दौर की सांस्कृतिक विविधता की झलक भी दिखाता है।
मंदिर की स्थापना से जुड़ी एक रोचक जनश्रुति प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार सम्राट अकबर बीकानेर के महाराजा रामसिंह के साथ इस क्षेत्र से गुजर रहे थे। उस समय यहां घना जंगल था। भूख-प्यास से व्याकुल होने पर उन्हें एक टीले पर खड़ी महिला मिली, जिसने तुरंत भोजन-पानी की व्यवस्था कर दी। अकबर ने उसे दैवीय शक्ति मानते हुए सेवा का आग्रह किया, जिस पर उस महिला ने यहां काली माता का मंदिर बनवाने की इच्छा जताई। इसके बाद अकबर के आदेश पर महाराजा रामसिंह ने यहां मंदिर का निर्माण कराया।
मंदिर परिसर में माता के अनन्य भक्त अमरनाथ जी का मंदिर भी है। किवदंती है कि उन्होंने अकबर के साले को किले के निर्माण के लिए अक्षय खजाना दिया था लेकिन बाद में उसकी नीयत बिगड़ गई। पश्चाताप होने पर वह अमरनाथ जी के पास पहुंचा। तब अमरनाथ जी ने मां काली के मंदिर के सामने जीवित समाधि लेकर अपनी समाधि पर मंदिर बनवाने की बात कही। आज वहां स्थित अमरनाथ मंदिर भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
आज भद्रकाली मंदिर क्षेत्र की जनआस्था और भक्ति का प्रतीक बन चुका है। इस मंदिर से जुड़ी एक विशेष बात यह भी है कि हर वर्ष बरसात के मौसम में आने वाली घग्गर नदी की बाढ़ का पानी इन मंदिरों के आसपास फैल जाता है। उस समय पूरा क्षेत्र पानी से घिरा हुआ दिखाई देता है। हालांकि चैत्र मास तक यह पानी एक सीमित धारा में बहने लगता है और मेले के दिनों तक अधिकांश पानी सूख जाता है जिससे श्रद्धालुओं के लिए मंदिर तक पहुंचना आसान हो जाता है।
यह मंदिर देवस्थान विभाग के अधीन है और यहां पूजा-अर्चना तथा अन्य व्यवस्थाओं का संचालन विभाग की देखरेख में किया जाता है। मेले के दौरान स्थानीय प्रशासन और हनुमानगढ़ सेवा समिति ( भारत क्लब) द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विभिन्न व्यवस्थाएं की जाती हैं। भद्रकाली मेला केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की लोक आस्था, परंपरा और सामाजिक जीवन का जीवंत प्रतीक भी है। यहां आने वाले हजारों श्रद्धालु केवल पूजा-अर्चना ही नहीं करते बल्कि इस अवसर को उत्सव की तरह मनाते हैं। इस प्रकार यह मेला आस्था, इतिहास और लोक संस्कृति के संगम का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
अमरपाल सिंह वर्मा( अदिति फीचर्स )