

दिन के बाद रात और रात के बाद दिन यही प्रकृति का नियम है। यह विधान बहुत कठोर है। इसमें कहीं भी नरमी अथवा सुविधा का स्थान नहीं है। सृष्टि के आरम्भ से ही ईश्वर ने यह विधान हमारे लिए बनाया है। सूर्य प्रातःकाल होते ही उदय होता है तब दिन होता है। जब चन्द्रमा प्रकट होता है तब रात्रि होती है। संध्या समय होने पर सूर्य अस्त हो जाता है और प्रातः होने पर चन्द्रमा विदा ले लेता है। इस क्रम कोई भी परिवर्तन आजतक नहीं हुआ और न ही कभी आने वाले समय में होगा।
सूर्य व चन्द्रमा के उदित और अस्त होने का यह क्रम निर्बाध रूप से निरन्तर चलता रहता है। इसमें कहीं कोई त्रुटि नहीं होती। न ही उन दोनों को कोई प्रतिदिन कोई काम पर जाने का आदेश देता है और न ही कोई अलार्म उन्हें जगाता है। कभी इन दोनों ने यह नहीं सोचा कि हम प्रतिदिन अपनी ड्यूटी करके थक गए हैं, चलो इन्सानों की तरह चार दिन की छुट्टी करके हम भी आराम कर लें अथवा देश-विदेश में कहीं भी घूम आएँ या किसी हिल स्टेशन की सैर कर आएँ।
कल्पना कीजिए यदि ऐसी स्थिति कभी आ जाए तब क्या होगा? सूर्य के उदय न होने पर चारों ओर बर्फ का साम्राज्य हो जाएगा। हम गरमी और प्रकाश पाने के लिए छटपटाएँगे। दिन नहीं होगा और चारों ओर अन्धकार की चादर बिछी हुई दिखाई देगी। नदियों और नालों का सारा पानी जम जाएगा। हम पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसेंगे। पानी नहीं होगा तो अनाज उत्पन्न नहीं होगा। तब हम दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाऍंगे। खाने के लिए हमें परेशानी हो जाएगी।
इसी प्रकार चन्द्रमा के न होने पर रात नहीं होगी। उसकी शीतलता से हम वंचित हो जाएँगे। सूर्य का प्रचण्ड प्रकोप हमें सहना पड़ेगा। इस प्रकार इन दोनों में से किसी एक के भी अवकाश पर चले जाने से सारे मौसमों और सारी ऋतुओं का चक्र गड़बड़ा जाएगा।
एवंविध सूर्य और चन्द्रमा के न होने की अवस्था में सारी सृष्टि में 'त्राहि माम्' वाली परिस्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इसी प्रकार अन्य प्राकृतिक संसाधनों के न होने पर भी संसार की स्थिति बहुत ही बिगड़ जाएगी। ईश्वर ने हम मनुष्यों को हर प्रकार का सुख और आराम देने के लिए सारा मायाजाल अथवा आडम्बर रचा है।
हमारे लिए उस मालिक ने दिन और रात बनाए हैं। इसका उद्देश्य यही है कि अपने स्वयं के लिए और घर-परिवार के दायित्वों को पूर्णरूपेण निभाने के लिए दिन भर जीतोड़ परिश्रम करो। जब थककर चूर हो जाओ तब रात हो जाने पर चैन की बाँसुरी बजाते हुए घोड़े बेचकर सो जाओ। अगली प्रातः तरोताजा होकर फिर से अपने काम में ने उत्साह से जुट जाओ।
मनुष्य सारा दिन हाड़ तोड़ मेहनत करके जब थकहार कर घर आता है तब उसे आराम करने की बहुत आवश्यक होता है। अगर ईश्वर ने रात न बनाई होती तो मनुष्य सो नहीं पाता। नींद न ले पाने के कारण अनिद्रा से परेशान होकर वह अनेक बिमारियों से ग्रस्त हो जाता। फिर डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए बहुमूल्य समय व धन की बरबादी होती।
इसी कड़ी में हम कह सकते हैं कि यदि ईश्वर ने दिन न बनाया होता तो चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार होता। हमें अपने कार्य करने के लिए कुछ भी नहीं सुझाई पड़ता। हम इधर-उधर ठोकरें खाने के लिए विवश हो जाते। अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए क्या कर पाते? यह बहुत ही विचारणीय प्रश्न हमारे सम्मुख आ खड़ा होता। उस स्थिति की कल्पना करने मात्र से ही मन परेशान हो जाता है। वास्तव में इसे अकल्पनीय ही कहा जा सकता है।
सूर्य का उदय होना हमें नवजीवन का सन्देश देता है और उसका अस्त होना जीवन के अन्तकाल का परिचायक है। सूर्य और चन्द्रमा दिन और रात के प्रतीक हैं जो हमें समझाते हैं कि जीवन में दुखों एवं कष्टों से पूर्ण रात कितनी भी लम्बी हो जाए, उसके बाद प्रकाश अवश्य आता है। सूरज और चन्दा की तरह जीवन में भी दिन और रात की तरह सुख एवं दुख की आँख मिचौली चलती रहती है। इसलिए जीवन में हार न मानते हुए आगे बढ़ते चले जाना चाहिए। यही प्रकृति की इस रचना का हम मनुष्यों के लिए सन्देश है। चन्द्र प्रभा सूद (उर्वशी)