धनतेरस का शाश्वत सत्य : संसार की समस्त संपदाओं से ऊपर है 'जीवन और स्वास्थ्य'

धनतेरस
धन्वंतरि Ai Generated Image
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कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की शाम होते ही बाज़ार जगमगाने लगते हैं। बर्तनों की खनक, सर्राफा दुकानों पर उमड़ी भीड़ और नए सामानों की खरीदारी की होड़ - आज हमारे लिए 'धनतेरस' का मतलब बस यहीं तक सिमट कर रह गया है। पर क्या कभी आपने ठहरकर सोचा है कि दीपावली के इस पंच-दिवसीय महापर्व का पहला दीया आरोग्य के देवता के नाम पर क्यों जलता है ?

पुराणों और आयुर्वेद के पन्नों को पलटें, तो धनतेरस का सच बाज़ार के शोर से बिल्कुल अलग, बेहद गहरा और जीवन बदल देने वाला है।

समुद्र मंथन का अंतिम उपहार : अमृत, न कि सोना !

कथा उस कालखंड की है जब दुर्वासा ऋषि के एक शाप ने सुर-लोक की सारी आभा छीन ली थी। देवगण शक्तिहीन और श्रीहीन हो चुके थे। इस संकट से उबरने के लिए क्षीरसागर के मंथन की योजना बनी। मंदराचल पर्वत की मथनी घूमी, वासुकि नाग की नेती खींची गई और समुद्र के गर्भ से एक के बाद एक चौदह दिव्य रत्न निकले। स्वयं महालक्ष्मी प्रकट हुईं, कामधेनु और कौस्तुभ मणि आए। पर मंथन तब तक अधूरा था, जब तक कि कार्तिक त्रयोदशी की पावन तिथि को भगवान धन्वन्तरि प्रकट नहीं हुए।

हाथों में कोई सोने का ढेर नहीं, बल्कि औषधियों और अमरत्व से भरा अमृत कलश था। भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले धन्वन्तरि ने संसार को यह स्पष्ट संदेश दिया - समस्त संपदाओं से ऊपर 'जीवन और स्वास्थ्य' है। यदि सांसें ही रोगमुक्त न हों, तो क्षीरसागर की कोई भी दौलत व्यर्थ है।

'पहला सुख निरोगी काया': लक्ष्मी का सच्चा निवास

"शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्"

अर्थात् जीवन के चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—तभी सिद्ध हो सकते हैं, जब यह देह स्वस्थ हो।

हम तिजोरियों में बंद सिक्कों को लक्ष्मी मान बैठते हैं, जबकि वैदिक दृष्टि कहती है कि हमारी 'काया' ही वह पवित्र घट है जिसमें जीवन रूपी चेतना का वास है।

  •    यदि पेट में भूख न हो, तो छप्पन भोग का कोई मोल नहीं।

  •    यदि देह व्याधियों से घिरी हो और मन चिंता की भट्टी में झुलस रहा हो, तो मखमली गद्दे भी नींद नहीं दे सकते।

आयुर्वेद के आदि-ग्रंथों के अनुसार, स्वस्थ होने का मूल अर्थ है- ‘स्व-स्थ’ (स्वयं के स्वरूप में स्थित होना)। जब हम अपनी दिनचर्या, आहार और विचारों को प्रकृति की लय से जोड़ते हैं, तभी भीतर 'अमृत' का संचार होता है।

रिवाजों के पीछे छुपा अद्भुत स्वास्थ्य-विज्ञान

धनतेरस पर निभाई जाने वाली हर छोटी परंपरा के पीछे ऋषि-मुनियों का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण था, जिसे हमने केवल औपचारिकता बना दिया :

    पीतल और तांबे के बर्तन ही क्यों? : पुराणों में पीतल को भगवान धन्वन्तरि की प्रिय धातु कहा गया है। आयुर्वेद और आधुनिक धातु-विज्ञान दोनों मानते हैं कि तांबे और पीतल के पात्रों में पानी रखने या भोजन पकाने से जल शुद्ध होता है, वात-पित्त-कफ का संतुलन बनता है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। नए बर्तन खरीदना दरअसल स्वास्थ्यप्रद जीवनशैली अपनाने का प्रतीक था, न कि केवल रसोई में सामान बढ़ाने का।

    झाड़ू की पूजा और 'अलक्ष्मी' की विदाई : धनतेरस पर नई झाड़ू लाने और उसकी पूजा करने की लोक-परंपरा है। हमारे शास्त्रों में कचरे और गंदगी को 'दरिद्रता' (अलक्ष्मी) माना गया है। जहां स्वच्छता, धूप और शुद्ध वायु होगी, वहीं सकारात्मक ऊर्जा और आरोग्य रूपी महालक्ष्मी टिकेंगी। यह परंपरा हमें अपने परिवेश और मन दोनों के जाले साफ करने की प्रेरणा देती है।

    चौखट पर यम का दीया : त्रयोदशी की संध्या को घर के मुख्य द्वार या दक्षिण दिशा में यमराज के निमित्त एक दीपक जलाया जाता है, जिसे 'यमदीपदान' कहते हैं। इसका उद्देश्य है—अकाल मृत्यु और असाध्य व्याधियों से मुक्ति। यह दीपक केवल तेल-बाती का नहीं, बल्कि हमारी उस जागरूकता का प्रतीक है जो हमें असावधानी, आलस्य और अस्वस्थ आदतों से बचाए रखती है।

इस धनतेरस, स्वयं को दें आरोग्य और सुकून का उपहार

धनतेरस वस्तुएं बटोरने का बाज़ारू उत्सव नहीं, अपनी जीवन-ऊर्जा को सहेजने का संकल्प-पर्व है।

इस बार जब आप घर के लिए कुछ नया खरीदें, तो एक संकल्प अपने शरीर और मन के लिए भी लें - संतुलित आहार का, प्रकृति के करीब लौटने का और तनाव को अलविदा कहने का। जब हमारी काया रोगमुक्त होगी और मन शांत होगा, तभी घर में महालक्ष्मी का वास्तविक और स्थायी प्रवेश होगा।

सोने की चमक वक्त के साथ फीकी पड़ सकती है, लेकिन एक स्वस्थ शरीर का ओज जीवनभर आपके साथ जगमगाता रहेगा। (युवराज) उमेश कुमार साहू

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