

द्रौपदी के चीर हरण का प्रसंग भी ऐसा ही अनूठा है। महाभारत तो बहुतों ने पढ़ा होगा। अनेक ने गीता पढ़ी होगी परंतु उस चीर हरण के पीछे की पृष्ठभूमि को समझने का प्रयास लगभग बहुत ही कम लोगों ने किया होगा।
जब भरी सभा में दुर्योधन ने पंचाली के वस्त्र उतारने के निर्देश दु:शासन को दिए तो वह अपने शील रक्षण के लिए सब तरफ निहारती रही। भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, अर्जुन, धर्मराज, बलशाली भीम को सिर झुकाए देख जब उसे यह एहसास हो गया कि यहां उपस्थित कोई भी उसके शील की रक्षा नहीं कर सकता तो उसने अंतिम गुहार कृष्ण को लगाई।
जब द्रौपदी की पुकार कृष्ण के हृदय को स्पर्श कर रही थी। उस वक्त वे वामकुक्षी के लिए जा रहे थे। उन्हें मालूम था कि उनमें अद्वितीय शक्ति है, ईश्वरीय अंश है, फिर भी वे सोच में पड़ गए । उसका कारण था कि किसी सती को चीर हरण से तभी बचाया जा सकता है जब उसने अपने जीवन में कभी भी वस्त्र दान किया हो। वे चिंतित हो उठे कि यदि द्रौपदी ने यह न किया हो तो वे अद्वितीय शक्ति के बावजूद भी दु:शासन को नहीं रोक पाएंगे। तब ईश्वर का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
उन्होंने तुरंत द्रौपदी की ओर कूच किया। उन्हें देख कर द्रौपदी आश्वस्त हो गई कि आज उसकी लाज कृष्ण बचा लेंगे। कृष्ण ने चीर हरण से पहले द्रौपदी से पूछा, 'द्रौपदी, क्या कभी तुमने अपने जीवन में कोई वस्त्र दान किया है?'
द्रौपदी ने कहा, 'हां कृष्ण, एक बार मैं नदी तट पर नहाने गई थी। उसी समय एक संत की लंगोटी नदी में बह गई। उनकी लाज रखने के लिए मैंने अपनी साड़ी का थोड़ा भाग फाड़ कर उनकी ओर फेंक दिया था जिसे पहन कर वे नदी से बाहर निकल गए। इसे ही मैंने वस्त्र दान समझा।'
कृष्ण की जान में जान आई। चीर हरण का आदेश होते ही दुष्ट दु:शासन द्रौपदी पर टूट पड़ा। वह उसकी साड़ी खींचता गया, खींचता गया परंतु उसे निर्वस्त्र नहीं कर सका। अंतत: दु:शासन थक-हार कर जमीन पर गिर पड़ा।
यह सभी जानते हैं कि श्रीकृष्ण की मायावी शक्ति ने दु:शासन को पछाड़ दिया परंतु सब ये नहीं जानते कि चीरहरण से बचाने के लिए वस्त्र दान का होना बहुत ही आवश्यक था। यदि दान का यह बल द्रौपदी के पास नहीं होता तो शायद श्रीकृष्ण भी असहाय सी स्थिति में होते।
खुंजरि देवांगन(उर्वशी)