दीपावली में रंगोली की परंपरा : रंगों से सजे आंगन में शुभता का स्वागत

दीपावली केवल दीपों का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में प्रकाश, सौंदर्य, समृद्धि और शुभता के स्वागत का पर्व है
Kolkata
रंगोली सदियों से भारतीय लोकजीवन और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा रही है
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दीपावली केवल दीपों का त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में प्रकाश, सौंदर्य, समृद्धि और शुभता के स्वागत का पर्व है। घरों की सफाई, दीपों की कतार, लक्ष्मी-गणेश पूजन और मिठाइयों के साथ एक परंपरा जो दीपावली की रौनक को और बढ़ा देती है, वह है-रंगोली। घर के आंगन, मुख्य द्वार या पूजा स्थल पर बनाई जाने वाली रंगोली सदियों से भारतीय लोकजीवन और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा रही है।

रंगोली का अर्थ क्या है?

‘रंगोली’ शब्द का संबंध रंगों से बने कलात्मक चित्रों से माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग नामों से जाना जाता है-कहीं अल्पना, कहीं कोलम, कहीं मुग्गु, तो कहीं मंडना। नाम और शैली भले ही अलग हों, लेकिन इनके पीछे की भावना लगभग एक जैसी है-घर में शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का स्वागत करना।

दीपावली के अवसर पर रंगोली बनाने की परंपरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। मान्यता है कि सुंदर और स्वच्छ प्रवेश द्वार तथा रंगोली घर में मां लक्ष्मी के स्वागत का प्रतीक हैं। इसी कारण कई परिवार दीपावली की सुबह घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाते हैं और उसके आसपास दीप जलाते हैं।

रंगोली और मां लक्ष्मी का संबंध

दीपावली की रात मां लक्ष्मी के पूजन का विशेष महत्व है। भारतीय लोकमान्यताओं में रंगोली को लक्ष्मी के स्वागत से जोड़कर देखा गया है। घर के दरवाजे पर बनाए गए कमल, पदचिह्न, स्वस्तिक, कलश और दीपक जैसे प्रतीक शुभ माने जाते हैं।

कमल मां लक्ष्मी का प्रमुख प्रतीक है, इसलिए दीपावली की रंगोली में कमल की आकृति विशेष रूप से बनाई जाती है। कई घरों में रंगोली से अंदर की ओर आते हुए लक्ष्मी के चरणों के छोटे-छोटे निशान भी बनाए जाते हैं। यह इस भाव को दर्शाता है कि समृद्धि और सुख घर में प्रवेश कर रहे हैं।

रंगोली केवल सजावट नहीं

आज रंगोली को अक्सर घर की सजावट का हिस्सा माना जाता है, लेकिन पारंपरिक रूप से इसका महत्व इससे कहीं अधिक है। भारतीय लोक परंपरा में किसी भी शुभ अवसर पर जमीन या आंगन को सजाना मंगल और अतिथि-सत्कार की भावना से जुड़ा रहा है। पुराने समय में महिलाएं सुबह घर के आंगन को साफ करने के बाद चावल के आटे, प्राकृतिक रंगों, फूलों और मिट्टी से रंगोली बनाया करती थीं। इसमें केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ाव भी दिखाई देता था।

चावल के आटे से रंगोली बनाने की परंपरा

पारंपरिक रंगोली में चावल का आटा महत्वपूर्ण सामग्री रहा है। इसके पीछे सौंदर्य के साथ-साथ एक सामाजिक भावना भी जुड़ी थी। चावल का आटा छोटे पक्षियों और चींटियों जैसे जीवों के लिए भोजन का माध्यम बनता था। इस तरह रंगोली बनाने की परंपरा मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य का संदेश भी देती थी। समय के साथ रंगोली में फूलों की पंखुड़ियों, हल्दी, सिंदूर, प्राकृतिक रंगों और बाद में बाजार में उपलब्ध रंगीन पाउडर का इस्तेमाल होने लगा।

हर क्षेत्र की अपनी रंगोली

भारत की विविधता रंगोली की परंपरा में भी दिखाई देती है। महाराष्ट्र और राजस्थान में अलग तरह की ज्यामितीय एवं पारंपरिक आकृतियां देखने को मिलती हैं। बंगाल में अल्पना की परंपरा है, जिसमें चावल के घोल से सफेद रंग की सुंदर आकृतियां बनाई जाती हैं। दक्षिण भारत में कोलम और मुग्गु की परंपरा विशेष प्रसिद्ध है। कहीं रंगोली ज्यामितीय आकृतियों पर आधारित होती है, तो कहीं फूल-पत्तियों, देवी-देवताओं और लोक प्रतीकों को इसमें स्थान दिया जाता है। यानी रंगोली सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि भारत की लोक-संस्कृति का जीवंत रूप है।

बदलते समय के साथ बदली रंगोली

आज के दौर में रंगोली की कला ने भी आधुनिक रूप ले लिया है। पारंपरिक रंगों के साथ अब फूलों की रंगोली, दीयों वाली रंगोली, स्टेंसिल रंगोली, 3D रंगोली और रेडीमेड रंगोली भी लोकप्रिय हो रही हैं। सोशल मीडिया ने भी इस कला को नई पहचान दी है। फिर भी पारंपरिक रंगोली का आकर्षण कम नहीं हुआ है। कई परिवार आज भी दीपावली की सुबह परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिलकर रंगोली बनाते हैं। बच्चों के लिए यह केवल सजावट नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और परंपरा से जुड़ने का अवसर भी बन जाता है।

रंगों में छिपा दीपावली का संदेश

दीपावली की रंगोली वास्तव में भारतीय जीवन-दर्शन का एक सुंदर प्रतीक है। अलग-अलग रंग मिलकर जिस तरह एक सुंदर आकृति बनाते हैं, उसी तरह जीवन में भी विविधता के बीच सामंजस्य जरूरी है। दीपों की रोशनी और रंगोली के रंग मिलकर यह संदेश देते हैं कि अंधकार के स्थान पर प्रकाश, निराशा के स्थान पर आशा और नकारात्मकता के स्थान पर सकारात्मकता का स्वागत किया जाए।

इसलिए दीपावली पर घर के आंगन में बनाई जाने वाली रंगोली महज रंगों की आकृति नहीं है। यह शुभता का आमंत्रण, समृद्धि की कामना, प्रकृति के प्रति संवेदना और पीढ़ियों से चली आ रही भारतीय लोकपरंपरा का सुंदर प्रतीक है। यही वजह है कि आधुनिकता के इस दौर में भी दीपावली की सुबह रंगों से सजा आंगन भारतीय घरों की सबसे खूबसूरत परंपराओं में से एक बना हुआ है।

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