

इस वर्ष अधिकमास (मलमास) में पड़ रही सोमवती अमावस्या धार्मिक दृष्टि से बेहद खास मानी जा रही है। लगभग 30 वर्षों बाद ऐसा दुर्लभ संयोग बन रहा है, जब अधिकमास की अमावस्या सोमवार के दिन पड़ रही है। 15 जून को आने वाली इस पुरुषोत्तमी अमावस्या पर श्रद्धालु गंगा सहित अन्य पवित्र नदियों में स्नान के साथ ही दान-पुण्य, पितृ तर्पण और देव पूजन कर विशेष पुण्य अर्जित करेंगे।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिकमास भगवान विष्णु को समर्पित होता है। ऐसे में इस अवधि में पड़ने वाली सोमवती अमावस्या का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, भगवान शिव और पितरों की पूजा-अर्चना का विशेष विधान बताया गया है।
मान्यता है कि इस दिन काशी के पौराणिक कुंडों, सरोवरों और तीर्थ स्थलों पर स्नान, पूजन और पितरों का तर्पण करने से गया और प्रयाग के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
धर्माचार्यों के मुताबिक खास तौर पर पंचक्रोशी यात्रा के अंतिम पड़ाव Kapildhara में पितरों के तर्पण का अत्यंत महत्व माना गया है। मान्यता है कि यहां श्रद्धापूर्वक तर्पण करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।
सोमवती अमावस्या का दिन विवाहित महिलाओं के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है। इस अवसर पर महिलाएं पीपल और बरगद के वृक्ष की विधि-विधान से पूजा कर उनकी परिक्रमा करेंगी।
मान्यता है कि पीपल और बरगद की पूजा से अखंड सौभाग्य, दांपत्य सुख और परिवार की समृद्धि प्राप्त होती है। धार्मिक ग्रंथों में इस दिन वृक्ष पूजन को विशेष फलदायी बताया गया है।
ज्योतिष के अनुसार अधिकमास में सोमवती अमावस्या का यह महासंयोग करीब तीन दशक बाद बन रहा है। इससे पहले ऐसा दुर्लभ योग 15 जुलाई 1996 को आषाढ़ के अधिकमास में बना था। इस बार बनने वाला संयोग स्नान, दान, जप, तप और पितृ कर्मों के लिए अत्यंत शुभ माना जा रहा है। वैसे भी अधिकमास 3 साल में एक बार आता है, इस कारण इसका महत्व वैसे भी काफी ज्यादा है।
धर्म विशेषज्ञों के अनुसार इस दिन शिव मंदिरों में भगवान शिव का जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से ग्रह बाधाएं दूर होती हैं तथा जीवन के कष्टों में कमी आती है।
अधिकमास और सोमवती अमावस्या के संयुक्त प्रभाव के कारण भगवान विष्णु और भगवान शिव की आराधना विशेष फलदायी मानी गई है।
सोमवती अमावस्या की शुरुआत 14 जून की रात 12.19 बजे से हो रही है, जो 15 जून की सुबह 8.23 बजे तक रहेगी।
15 जून को पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए अमृतकाल का मुहूर्त सुबह 11:28 बजे से दोपहर 12:52 बजे तक है। इसी तरह अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:54 से दोपहर 12:50 बजे तक है।
इन शुभ मुहूर्तों में स्नान, दान, तर्पण और पूजा-पाठ करने का विशेष महत्व बताया गया है।
अधिकमास की अमावस्या पर पितरों का तर्पण विशेष फलदायी होता है। मान्यता है कि इससे पितृ प्रसन्न होकर अपने वंशजों के जीवन से संकट, बाधाएं और कष्ट दूर करते हैं। इस दिन किए गए धार्मिक कार्यों का पुण्य भी कई गुना बढ़ जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार 15 जून की सोमवती अमावस्या श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक उन्नति, पितृ शांति और पारिवारिक सुख-समृद्धि का विशेष अवसर लेकर आ रही है। काशी समेत देशभर के तीर्थस्थलों पर इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
सोमवती अमावस्या का दिन इसलिए भी खास है, क्योंकि इस बार 15 जून की दोपहर 12.58 बजे सूर्य देव मिथुन राशि में गोचर करेंगे। इसे मिथुन संक्रांति भी कहा जाता है। मिथुन संक्रांति का पुण्य काल 12.59 बजे से शाम 07.20 बजे तक करीब 6 घंटे 21 मिनट और इसका महापुण्यकाल 12:59 बजे से दोपहर 03:19 बजे तक करीब 2 घंटे 20 मिनट का होगा।