मन को भटकने से बचाएं

Mind
मन
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अपने मन को सदा शान्त और प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए। उसे अनावश्यक ही इधर-उधर भटकने से बचाना अचाहिए। यदि मन ही भटकने लगेगा तब मनुष्य कभी सहज नहीं हो सकता। वह बैचेन होने लगता है। उसके लिए एक-एक पल व्यतीत करना बहुत कठिन हो जाता है। उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता। न ही उसकी किसी से बात करने की इच्छा होती है। उस समय उसका किसी वस्तु में मन नहीं लगता। वह बस अकेला रहना चाहता है। 

यहां हम चर्चा करते हैं कि बड़े शहरों में प्रायः सारा दिन बिजली रहती है। यदि थोड़ी देर के लिए न भी रहे तो महसूस नहीं होता। इसका कारण है कि वहां पर प्रायः सबने अपने घरों में इन्वर्टर लगाए हुए होते हैं। इसके विपरीत छोटे शहरों और दूर-दराज के इलाकों में बिजली की समस्या बहुत विकट होती है। बिजली कब जाती है और कब आती है, इसका कुछ भी ठिकाना नहीं होता। इसलिए वहां पर रहने वाले लोग परेशान होने लगते हैं। वे बिजली विभाग को कोसने लगते हैं।

किसी दूर के इलाके में बिजली न होने के कारण एक व्यक्ति बहुत परेशान हो गया। रात का समय हो गया था पर लाइट नहीं आई थी। उसे अपना कोई बहुत जरूरी कार्य निपटाना था। इसलिए उसने अपने कमरे में रात के समय रोशनी करने के लिए एक छोटा-सा दीया जला दिया। अपने हाथ में लिए गए उस आवश्यक कार्य को उसने निपटा दिया। आधी रात का समय हो गया था और वह बहुत थक भी गया था। उसने सोचा कि अब सो जाना चाहिए। 

प्रकृति का यह अलौकिक रूप देखकर उस व्यक्ति के चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित भाव आ गया। उसके मन में यह विचार आया कि एक छोटा-सा दीपक अंधकार का मुकाबला डटकर सकता है, अपना प्रकाश फैला सकता है। जब तक चाहे उसकी राह का रोड़ा बन सकता है। मनुष्य उस छोटे से दीये की तरह दृढ़प्रतिज्ञ और साहसी क्यों नहीं बन सकता ?

उसने फूंक मारकर वह दीया बुझा दिया तो उस कमरे में अंधेरा हो गया। उसे यह देख कर हैरानी हुई कि जब तक दीया कमरे में जल रहा था, तब तक चांद कमरे के बाहर खड़ा होकर दीये के बुझने की प्रतीक्षा कर रहा था। कहने का तात्पर्य यह है कि कमरे में अंधेरा होते ही उसे बाहर चन्द्रमा की रोशनी दिखाई देने लगी। इसी प्रकार प्रातः कालीन सूर्य हमारे घर के दरवाजे खुलने की प्रतीक्षा में बाहर खड़ा रहता है। ज्यों ही दरवाजा खुलता है वह मुस्कुराता हुआ अपनी रोशनी घर के अन्दर और बाहर चारों ओर बिखेर देता है। उसी प्रकार दीये के बुझते ही चन्द्रमा की किरणें उस अंधेरे कमरे में फैल गईं। उसने अपनी शीतल चाँदनी हर तरफ बिखेर दी। प्रकृति का यह अलौकिक रूप देखकर उस व्यक्ति के चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित भाव आ गया। उसके मन में यह विचार आया कि एक छोटा-सा दीपक अंधकार का मुकाबला डटकर सकता है, अपना प्रकाश फैला सकता है। जब तक चाहे उसकी राह का रोड़ा बन सकता है। मनुष्य उस छोटे से दीये की तरह दृढ़प्रतिज्ञ और साहसी क्यों नहीं बन सकता ? वह अपने मन को उत्साहित क्यों नहीं कर सकता ?

सूर्य और चन्द्रमा के समान परम तेजस्वी परमात्मा को स्वयं से दूर करने के लिए हमने भी अपने जीवन में इसी तरह के बहुत से छल-प्रपंच किए हुए हैं। उसकी सुन्दर छवि यानी उसके दिव्य प्रकाश को निहारने की हम बिल्कुल भी कोशिश नहीं करते। उससे सब कुछ पा जाना चाहते हैं पर उसको पाने के लिए कोई परिश्रम नहीं करना चाहते।

हर जीव को तुच्छ समझने की हमारी प्रवृत्ति ही हमारे विनाश का कारण बन जाती है। इसलिए हम हर समय अशान्त रहते हैं। हम तनावग्रस्त हो जाते हैं। उसका दुष्प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है।

हम अपने मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार के कारण व्यर्थ ही के दुराग्रह पाले रहते हैं। अपने स्वार्थ में हम अन्धे हो जाते हैं, इस कारण हमें कुछ भी नहीं दिखाई देता। हम अपने मन के अंधेरों में घिरे रहते हैं।‌ उस समय अपने ऊपर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं रहता। बिना सोचे-समझे हम अनर्गल प्रलाप करने लगते हैं। हर जीव को तुच्छ समझने की हमारी प्रवृत्ति ही हमारे विनाश का कारण बन जाती है। इसलिए हम हर समय अशान्त रहते हैं। हम तनावग्रस्त हो जाते हैं। उसका दुष्प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। हमारी कार्यक्षमता दिनों-दिन प्रभावित होती है। इस सबसे बढ़कर हमारे ही स्वजन सारा दिन घर के बोझिल माहौल के कारण परेशान होते रहते हैं। घर में नकारात्मक ऊर्जा अपने पैर पसारने लगती है। देखते ही देखते घर में अशान्ति का साम्राज्य हो जाता है। यह वातावरण घर के किसी भी सदस्य के लिए भी सुखदायी नहीं होता।

जब तक मनुष्य अपनी वाणी को विश्राम नहीं देता तब तक उसका मन शान्त नहीं रह सकता। अशान्त मन में तो ईश्वर का वास नहीं हो सकता।  

सबसे अधिक खलबली हमारी वाणी मचाती है। उसका बेलगाम हो जाना खतरे की घण्टी बन जाती है। यही वाणी राज कराती है और यही दर-दर की ठोकरें खिलाती है। इसकी कटुता को कोई भी सहन नहीं कर सकता। इसको नियन्त्रण में रखना बहुत आवश्यक होता है अन्यथा जीवन भर पश्चाताप करना पड़ता है। जब तक मनुष्य अपनी वाणी को विश्राम नहीं देता तब तक उसका मन शान्त नहीं रह सकता। अशान्त मन में तो ईश्वर का वास नहीं हो सकता।  अपने मन को पवित्र बनाना बहुत आवश्यक होता है। तभी उस शुद्ध मन में ईश्वर का निवास बन सकता है। जहाँ तक हो सके अपने मन को भटकने से बचाना चाहिए। जब तक मनुष्य के मन में स्थिरता नहीं आ पाएगी तब तक वह अपने अन्तस में विद्यमान परमेश्वर की उपस्थिति को अनुभव नहीं कर सकता। चन्द्र प्रभा सूद (उर्वशी)

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