गणेश चतुर्थी 10 दिन ही क्यों मनाई जाती है?

14 सितंबर से शुरू होगा गणेशोत्सव, 25 को अनंत चतुर्दशी पर होगा समापन
गणपति बप्पा के साथ विराजमान मूषक, उत्सव का शुभ रंग बिखेरते हुए।
गणपति बप्पा के साथ विराजमान मूषक, उत्सव का शुभ रंग बिखेरते हुए।Ai generated
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तनीशा, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता: गणेश चतुर्थी आते ही घरों और पंडालों में बप्पा के स्वागत की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कहीं छोटे से गणपति घर में विराजते हैं तो कहीं बड़े पंडालों में कई दिनों तक उत्सव चलता है। इस साल गणेश चतुर्थी 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी और 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के साथ गणेशोत्सव का प्रमुख समापन होगा। इस दौरान गणपति की पूजा, आरती, प्रसाद और अलग-अलग सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला चलता है।

चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक

गणेश चतुर्थी भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। इसके साथ गणेशोत्सव की शुरुआत होती है और अनंत चतुर्दशी को इसका प्रमुख समापन माना जाता है। इसी वजह से चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक चलने वाले उत्सव को आम तौर पर 10 दिवसीय गणेशोत्सव कहा जाता है। अनंत चतुर्दशी गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन का प्रमुख दिन भी है।

हालांकि यहां एक बात समझना जरूरी है। 10 दिन का मतलब यह नहीं कि हर घर में गणपति की प्रतिमा 10 दिन ही रखी जाती है। कई परिवारों में डेढ़ दिन, तीन, पांच या सात दिन बाद विसर्जन की परंपरा है। यानी गणेशोत्सव की अवधि परिवार, क्षेत्र और स्थानीय परंपरा के अनुसार बदल सकती है।

श्रद्धा और उत्सव के बीच भव्य रूप में विराजे बप्पा।
श्रद्धा और उत्सव के बीच भव्य रूप में विराजे बप्पा।

पहले इतना लंबा नहीं था उत्सव

गणेशोत्सव का इतिहास बताता है कि आज जिस बड़े और लंबे सार्वजनिक उत्सव को हम देखते हैं, वह हमेशा इसी रूप में नहीं था। महाराष्ट्र और दक्कन के कुछ हिस्सों में गणेश पूजा की पुरानी परंपरा में करीब डेढ़ दिन के उत्सव का भी उल्लेख मिलता है। समय के साथ यह पूजा घरों से निकलकर सामुदायिक आयोजन का रूप लेने लगी।

19वीं सदी के अंत में इस बदलाव को नई दिशा मिली। 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश उत्सव को बड़े सार्वजनिक आयोजन के रूप में लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सार्वजनिक पंडाल, सामूहिक पूजा और विसर्जन जुलूस के जरिए उत्सव में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी बढ़ी।

यही वह दौर था जब गणेशोत्सव केवल परिवार तक सीमित धार्मिक आयोजन से आगे बढ़कर बड़े सामुदायिक उत्सव के रूप में पहचान बनाने लगा। सार्वजनिक गणपति मंडलों की संख्या बढ़ी और उत्सव से जुड़े कार्यक्रम भी बढ़ते गए।

10 दिन का उत्सव, लेकिन परंपराएं अलग-अलग

आज महाराष्ट्र समेत देश के कई हिस्सों में गणेशोत्सव को 10 दिन तक चलने वाले प्रमुख उत्सव के रूप में देखा जाता है। हालांकि हर जगह इसका स्वरूप एक जैसा नहीं है। कुछ परिवार एक ही दिन या कुछ दिनों बाद विसर्जन करते हैं, जबकि कई सार्वजनिक मंडल अनंत चतुर्दशी तक गणपति रखते हैं। 2026 में भी अलग-अलग शहरों में उत्सव की अवधि स्थानीय व्यवस्था और मंडलों की परंपरा के अनुसार अलग देखने को मिल रही है।

इस साल 14 सितंबर को बप्पा का स्वागत होगा और 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी पर बड़े स्तर पर विसर्जन होगा। इस तरह गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक का समय स्वागत, पूजा और उत्सव से लेकर विदाई तक का सफर बन जाता है।

यानी गणेशोत्सव के 10 दिन किसी एक जगह लागू होने वाला नियम नहीं, बल्कि पंचांग की तिथियों, पुरानी परंपराओं और समय के साथ विकसित हुए सार्वजनिक उत्सव का मिला-जुला रूप हैं। यही वजह है कि आज गणेश चतुर्थी कहीं एक दिन की पूजा है, कहीं कुछ दिनों का पारिवारिक उत्सव और कहीं अनंत चतुर्दशी तक चलने वाला बड़ा सार्वजनिक आयोजन।

गणपति बप्पा मोरया !

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