हर कर्म पवित्र, हर कर्तव्य ईश्वर-उपासना

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किसी भी राष्ट्र में नागरिकों के लिए अधिकार और कर्तव्य दोनों ही महत्वपूर्ण है। विचार करें कि अधिकार और कर्तव्य एक सिक्के के दो पहलू हैं। दूसरे शब्दों में कहें कि कर्तव्यों का पालन किए बिना अधिकारों का उपभोग संभव नहीं है। हम सभी अपने अधिकारों की तो बात करते हैं लेकिन क्या हम अपने कर्तव्यों को भी जानते हैं? संविधान के द्वारा दिए हुए कर्तव्य जितने महत्वपूर्ण है, उतने ही हमारे सामाजिक कर्तव्य भी महत्वपूर्ण है। हमें दोनों का ही पालन करना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद लिखते हैं कि, मैं फिर कहता हूं, जो मनुष्य छोटा काम करता है वह उस कारण उस व्यक्ति से छोटा नहीं जो बड़ा काम करता है। मनुष्य की महत्ता उसके कर्तव्य में नहीं, अपितु कर्तव्य पालन में होती है।

वर्तमान में हमारे 11 (ग्यारह) मूल कर्तव्य हैं।कर्त्तव्यों का शाब्दिक अर्थ है- मानव के द्वारा करने योग्य कार्य।दूसरे शब्दों में कहें कि कर्तव्य एक प्रकार का बन्धन है।कर्तव्य के प्रति स्वामी विवेकानंद लिखते हैं कि, मैं फिर कहता हूं, जो मनुष्य छोटा काम करता है वह उस कारण उस व्यक्ति से छोटा नहीं जो बड़ा काम करता है। मनुष्य की महत्ता उसके कर्तव्य में नहीं, अपितु कर्तव्य पालन में होती है।कर्तव्य कार्य को करने का दायित्व है, जिसे एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति या समाज के प्रति निभाना या उसका पालन करना चाहिए। व्यक्ति जो अपने प्रति नहीं चाहता, उसे वह दूसरों के प्रति भी न करे अथवा जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने प्रति नहीं चाहते, वैसा व्यवहार हम दूसरों के प्रति भी नहीं करें।

वह बहुत ही प्रसन्न हुआ, अपने भीतर शक्ति के इस विकास से वह फूला न समाया, एक देखने मात्र से वह कौए और सारस को भस्म कर सकता था!

हमारी युवा पीढ़ी को बहुत सी प्राचीन कथा-कहानियों को भी जान लेना चाहिए। स्वामी विवेकानंद अपनी पुस्तक कर्म योग के मनुष्य का कर्तव्य अध्याय में एक कहानी के माध्यम से समाज को कर्तव्य के बारे में बताते और समझाते हैं। वे लिखते हैं कि,एक संन्यासी ने वन में जाकर तपस्या की और बहुत दिनों तक योगाभ्यास किया। बारह वर्ष तक कठिन परिश्रम और अभ्यास करने के पश्चात वह एक दिन वृक्ष के नीचे बैठा था कि उसके सिर पर कुछ सूखी पत्तियां गिरीं। उसने ऊपर दृष्टि उठाई तो कौए और सारस को लड़ते देखा। उसे बड़ा क्रोध आया। उसने कहा, तुम्हारी इतनी सामर्थ्य जो मेरे ऊपर तुम सूखी पत्तियां गिराओ? और जैसे क्रोध-भरी दृष्टि से उसने उन्हें देखा, तो उसके मस्तक से आग की लपट छूटीं- उसकी शक्ति ही ऐसी थी- और दोनों भस्म हो गए। वह बहुत ही प्रसन्न हुआ, अपने भीतर शक्ति के इस विकास से वह फूला न समाया, एक देखने मात्र से वह कौए और सारस को भस्म कर सकता था!

जीवन भर मैंने अपने धर्म पालन करने की चेष्टा की है। लड़की की भांति जब मैं अविवाहित थी, मैंने धर्म का पालन किया और अब जब विवाह हो गया है तब भी मैं अपने धर्म का पालन कर रही हूं। यही मेरा योग है, जिसका मैं अभ्यास करती हूं और धर्म का पालन करने से मुझे ज्ञान-ज्योति मिल गई है, इसलिए मैं तुम्हारे विचार और जो कुछ तुमने वन में किया था, जान सकी

कुछ समय बाद उसे नगर में भिक्षा के लिए जाना पड़ा। एक दरवाजे के पास खड़े हो उसने कहा- "मां, भिक्षा मिले।" भीतर से आवाज आई- "बेटा, थोड़ी देर धीरज रक्खो।" युवक ने सोचा 'ओ क्षुद्र स्त्री, तेरा इतना साहस जो मुझे धीरज रखने को कहती है! तुझे अभी मेरी शक्ति का पता नहीं।' वह ऐसा सोच ही रहा था कि भीतर से फिर आवाज आई- "बच्चे अपनी शक्ति का बहुत गुमान न कर, यहां न तो कौआ है, न सारस।" वह आश्चर्य में पड़ गया, फिर भी उसे ठहरना पड़ा। अन्त में वह स्त्री आई और उसके चरणों पर गिर कर वह बोला- "माता, तुम्हें यह सब कैसे मालूम हुआ?" उसने कहा "पुत्र, मुझे तुम्हारा योग या तुम्हारी क्रियाएं नहीं आतीं। मैं एक साधारण स्त्री हूं, परन्तु मैंने तुम्हें ठहराया इसलिए कि मेरे पतिदेव अस्वस्थ थे, मैं उनकी सेवा कर रही थी और वह मेरा धर्म था। जीवन भर मैंने अपने धर्म पालन करने की चेष्टा की है। लड़की की भांति जब मैं अविवाहित थी, मैंने धर्म का पालन किया और अब जब विवाह हो गया है तब भी मैं अपने धर्म का पालन कर रही हूं। यही मेरा योग है, जिसका मैं अभ्यास करती हूं और धर्म का पालन करने से मुझे ज्ञान-ज्योति मिल गई है, इसलिए मैं तुम्हारे विचार और जो कुछ तुमने वन में किया था, जान सकी परन्तु यदि तुम्हें इससे अधिक जानने की इच्छा है तो अमुक नगर की हाट में जाओ और वहां तुम्हें एक कसाई मिलेगा, वह कुछ बताएगा जिसे सीख कर तुम्हें बड़ा आनन्द होगा।" संन्यासी ने सोचा- 'नगर जाकर क्या करूं और एक कसाई के पास!'

कसाई ने उसकी ओर देखकर कहा- स्वामी जी, क्या उस स्त्री ने आपको यहां भेजा है? कृपा कर थोड़ी देर बैठ जाइए जब तक मैं अपना काम न समाप्त कर लूं। संन्यासी ने मन में कहा- अब यहां यह क्या हो रहा? और वह बैठ गया; कसाई अपना काम करता रहा।

परन्तु जो कुछ उसने देखा था, उससे उसकी आंखें कुछ-कुछ खुल चुकी थीं; इसलिए नगर के पास पहुंच वह हाट में आया और वहां उसने एक मोटे कसाई को बड़े-बड़े चाकुओं से पशुओं को काटते-छांटते और ग्राहकों से बातचीत करते और मोल-तोल करते देखा 'भगवान भला करे'- युवक ने सोचा, 'क्या इसी आदमी से मुझे शिक्षा पानी है? यह तो साक्षात राक्षस है। उसी समय कसाई ने उसकी ओर देखकर कहा- स्वामी जी, क्या उस स्त्री ने आपको यहां भेजा है? कृपा कर थोड़ी देर बैठ जाइए जब तक मैं अपना काम न समाप्त कर लूं। संन्यासी ने मन में कहा- अब यहां यह क्या हो रहा? और वह बैठ गया; कसाई अपना काम करता रहा। सौदा बेचकर पैसे ले उसने संन्यासी से कहा- आइए, मेरे घर चलिए।" वे दोनों घर गए और कसाई ने उसे आसन दे कहा- "यहां बैठिए। वह भीतर गया जहां उनके माता-पिता थे। उसने उन्हें स्नान करा भोजन कराया और हर तरह से उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा की।

संन्यासी ने उससे आत्मा और परमात्मा के विषय में कुछ प्रश्न किए जिस पर कसाई ने एक व्याख्यान दिया जो कि आज भी भारतवर्ष में व्याध-गीता के नाम से प्रसिद्ध है। वेदान्त में, दर्शन में, वह सर्वोच्च उड़ानों में से एक है।
Summary

मैं तुम्हारा योग नहीं जानता, न संन्यासी हुआ हूं, न संसार छोड़ कभी वन में गया हूं। फिर भी जो कुछ तुमने देखा-सुना है, वह मेरे अनासक्त हो कर्तव्य पालन का परिणाम है।

उसके बाद संन्यासी के सामने आकर वह बैठ गया और बोला- अच्छा देव, आप मुझे देखने आए हैं, आज्ञा दीजिए मैं आपकी क्या सेवा करूं?" तब संन्यासी ने उससे आत्मा और परमात्मा के विषय में कुछ प्रश्न किए जिस पर कसाई ने एक व्याख्यान दिया जो कि आज भी भारतवर्ष में व्याध-गीता के नाम से प्रसिद्ध है। वेदान्त में, दर्शन में, वह सर्वोच्च उड़ानों में से एक है। कृष्ण व्याख्यान भगवद्‌गीता के विषय में आपने सुना है। जब आप उसे पढ़ लें, तो व्याधगीता पढ़ें। वेदान्त का सार उसमें निचोड़कर रखा है। जब कसाई कह चुका, तो संन्यासी को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने कहा- "आप यह शरीर क्यों धारण किए हैं? आप इतने ज्ञानी होते हुए भी चाण्डाल शरीर में हैं और ऐसा घृणित नीच कर्म करते हैं? चाण्डाल ने उत्तर दिया- कोई भी कर्तव्य घृणित नहीं, कोई भी कर्तव्य अपवित्र नहीं। मैं ऐसे ही कुल में, जाति में, परिस्थितियों में उत्पन्न हुआ था। बचपन से ही मैंने यह कर्म करना सीखा। मैं अनासक्त हूं और अच्छी तरह अपना रोजगार करने का प्रयत्न करता हूं, गृहस्थ के कर्तव्य का यथाशक्ति पालन करता हूं और जो कुछ भी होता है, उससे माता-पिता को प्रसन्न रखता हूं। मैं तुम्हारा योग नहीं जानता, न संन्यासी हुआ हूं, न संसार छोड़ कभी वन में गया हूं। फिर भी जो कुछ तुमने देखा-सुना है, वह मेरे अनासक्त हो कर्तव्य पालन का परिणाम है।

इस दृष्टि से कहानी में स्त्री और चाण्डाल ने अपने कर्तव्य का पालन किया और प्रसन्नता, सहृदयता, अपनी पूर्ण इच्छा के साथ। परिणाम यह हुआ कि वे ज्ञानी हो गए। प्रत्येक कार्य पवित्र है और कर्तव्य की उपासना ईश्वर-उपासना है। हमें अपने कर्तव्यों का पालन हर क्षण करना चाहिए। संवैधानिक रूप से भी और सामाजिक रूप से भी। हमारे सामाजिक दायित्वबोध जितने भी है, हमें उन सभी का पालन करना चाहिए। सुकरात ने कहा है कि सत्य को नकारते हुए लोगों ने उसे न्यायालय में घसीटा है।व्यक्ति सामाजिक और सैद्धान्तिक दोनों ही पक्षों को जानते हुए भी बुरे रास्ते को चुन लेता है। हमें कर्तव्य विमुख नहीं होना चाहिए, बल्कि हर स्थिति में कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। यही राष्ट्र की सुख-समृद्धि का मार्ग है। ( अदिति फीचर्स )   डॉ. नीरज भारद्वाज

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