सर्जरी से प्रसव के बाद महिलाओं के लिए डायलिसिस बना मुसीबत

कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सर्जरी से प्रसव कराने वाली 5 महिलाएं किडनी संक्रमण की शिकार
सांकेतिक तस्वीर
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कोटा : राजस्थान के कोटा के एक अस्पताल में दो माह पहले प्रसव के लिए भर्ती हुईं महिलाओं को उम्मीद थी कि दो दिन बाद अस्पताल से उन्हें छुट्टी मिल जाएगी और वे गोद में अपने नवजात शिशु को लेकर खुशी-खुशी घर जाएंगी लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि वे अपने साथ पीड़ा, आर्थिक संकट और डायलिसिस का अंतहीन सिलसिला लेकर जाएंगी।

कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल (NMCH) में सर्जरी से प्रसव कराने वाली पांच महिलाएं किडनी में संक्रमण का शिकार हो गईं और गंभीर समस्या से जूझते हुए वे लगातार इलाज और डायलिसिस पर निर्भर हैं।

मोहन लाल की पत्नी धन्नी सुमन मई के पहले सप्ताह से अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने कहा कि अब धन्नी डायलिसिस शब्द से ही डर जाती हैं।

अस्पताल में मोहन लाल ने कहा, डायलिसिस शुरू होने के एक घंटे के भीतर ही उसे उल्टी होने लगती है, खूब कंपकंपी आती है और तेज बुखार हो जाता है। उन दिनों वह कुछ खा भी नहीं पाती।

इन महिलाओं को पिछले 68 दिनों में 32 बार डायलिसिस कराना पड़ा है। वहीं, न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और जेके लोन अस्पताल में सर्जरी से प्रसव के बाद हुई जटिलताओं के कारण पांच अन्य महिलाओं की मौत भी हो चुकी है।

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प्रभावित महिलाओं के परिवारों ने सोमवार को जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर किडनी प्रतिरोपण के लिए निश्चित समयसीमा तय करने की मांग की। परिवारों ने प्रशासन को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है।

मोहन लाल ने कहा, हम उन्हें इस तरह और पीड़ा में नहीं देख सकते। अगर 48 घंटे के भीतर किडनी प्रतिरोपण के लिए लिखित आश्वासन नहीं दिया गया, तो हम उन्हें डायलिसिस के लिए लाना बंद कर देंगे और उन्हें मरने के लिए छोड़ देंगे। हम जिंदा लाश बन गए हैं।

एक अन्य महिला 29 वर्षीय रागिनी मीणा अब पूरी तरह डायलिसिस पर निर्भर हैं। उनके भाई विकास ने कहा, मेरी बहन यहां बच्चे को जन्म देने आई थी और उसे लगा था कि सिर्फ दो दिन में घर लौट जाएगी। आज स्थिति यह है कि वह डायलिसिस के बिना 24 घंटे भी जीवित नहीं रह सकती। हर 48 घंटे में उसे यह प्रक्रिया करवानी पड़ती है।

विकास के अनुसार रागिनी के पति लोकेश एक फाइनेंस कंपनी में काम करते थे लेकिन अब उनकी नौकरी चली गई है। अब परिवार पूरी तरह उधार के पैसों पर निर्भर है। कैब चालक मोहन लाल को भी अपनी पत्नी के इलाज और अस्पताल में रहने के खर्च के लिए अपनी रोजी-रोटी का एकमात्र साधन अपनी टैक्सी बेचनी पड़ी।

उन्होंने कहा, खर्च संभालना असंभव हो गया था। मुझे अपनी टैक्सी बेचनी पड़ी। अब वह पैसा भी लगभग खत्म हो चुका है। उनके बच्चे का जन्म आठ मई को हुआ था और इस वक्त एक रिश्तेदार उनकी देखरेख कर रहे हैं। उनके दो अन्य बच्चे हैं जिनकी उम्र 5 और 10 साल हैं, वे घर पर अपनी दादी के साथ रह रहे हैं।

पीड़ित महिला पिंकी के पति नरेश ने आरोप लगाया कि सरकार ने महिलाओं और उनके परिवारों की पीड़ा से आंखें मूंद ली हैं। जेके लोन अस्पताल में आठ मई को जन्मे उनके बच्चे की प्रसव के तुरंत बाद मौत हो गई थी।

प्रभावित परिवारों में आरती चोपदार और सुशीला महावर के परिवार भी शामिल हैं। उन्होंने राज्य सरकार से जवाबदेही तय करने और तत्काल जीवनरक्षक कदम उठाने की मांग की है।

राजस्थान सरकार ने कोटा के अस्पतालों में प्रसव के बाद हुई जटिलताओं की जांच के आदेश दिए हैं। जांच में कुछ ऐसी दवाएं मिलीं जिनकी गुणवत्ता खराब थीं लेकिन प्रसव के बाद हुई समस्याओं से उनका सीधा संबंध नहीं पाया गया। इन दवाओं को बाद प्रतिबंधित कर दिया गया राजस्थान के बीकानेर, भीलवाड़ा और बांसवाड़ा से भी मातृ मृत्यु के मामले सामने आए हैं।

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