

महर्षि अरविन्द महान युगद्रष्टा, आध्यात्मिक गुरु, चिंतक, राष्ट्रवादी, स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद, योगी, दार्शनिक एवं कवि थे। उनका जीवन स्वतंत्रता संग्राम, आध्यात्मिक साधना, साहित्य, शिक्षा, दर्शन और मानवता के सर्वांगीण विकास का समन्वय है। उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को नई दिशा दी तथा आध्यात्मिक चेतना को आधुनिक विज्ञान और मानव विकास से जोड़ा। उनका जीवन भारत और मानवता के लिए एक प्रेरणास्रोत है।
अरविन्द का जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता के एक उच्च वर्गीय बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता कृष्णधन घोष प्रसिद्ध डॉक्टर थे। उनकी मां स्वर्णलता देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। पांच वर्ष की उम्र में अरविन्द ने दार्जिलिंग के लोरेटो कॉन्वेंट स्कूल में दाखिला लिया। दो वर्ष बाद 1879 में उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अपने भाई के साथ इंग्लैंड भेजा गया। अरविन्द ने वहां अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, ग्रीक एवं इटैलियन भाषाओं में निपुणता प्राप्त की। कई वर्षों तक वहां रहने के बाद 1890 में 18 वर्ष की आयु में उन्हें कैंब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला, जहां उन्होंने दर्शनशास्त्र की पढ़ाई पूरी की। अरविन्द घोष ने अपने पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए आईसीएस की परीक्षा तो उत्तीर्ण कर ली थी, मगर देशभक्ति से प्रेरित इस युवा ने जान-बूझकर घुड़सवारी की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और राष्ट्रसेवा करने की ठान ली।
1896 से 1905 तक उन्होंने बड़ौदा रियासत में राजस्व अधिकारी से लेकर बड़ौदा काॅलेज में फ्रेंच अध्यापक और उपाचार्य रहने तक रियासत की सेना में क्रान्तिकारियों को प्रशिक्षण भी दिलाया था। हजारों युवकों को उन्होंने क्रान्ति की दीक्षा दी।
अरविन्द घोष के विचारों और उनकी प्रतिभा से बड़ौदा नरेश अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने अरविन्द घोष को अपनी रियासत में शिक्षा शास्त्री के रूप में नियुक्त कर लिया। अरविन्द ने यहां अपने कर्तव्यों का सम्यक निर्वहन करते हुए संस्कृत, बांग्ला भाषा और भारतीय दर्शन का गहन अध्ययन किया। योग और आध्यात्मिक साधना में भी उनकी रुचि बढ़ने लगी। यही समय था जब उन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए योजनाएं बनानी शुरू कीं। 1896 से 1905 तक उन्होंने बड़ौदा रियासत में राजस्व अधिकारी से लेकर बड़ौदा काॅलेज में फ्रेंच अध्यापक और उपाचार्य रहने तक रियासत की सेना में क्रान्तिकारियों को प्रशिक्षण भी दिलाया था। हजारों युवकों को उन्होंने क्रान्ति की दीक्षा दी। अरविन्द व्यक्तिगत जीवन में रुपये-पैसे का हिसाब नहीं रखते थे परन्तु राजस्व विभाग में कार्य करते समय उन्होंने जो विश्व की प्रथम आर्थिक विकास योजना बनायी, उसका क्रियान्वयन करके बड़ौदा राज्य देशी रियासतों में अन्यतम बन गया था।
1905 में बंगाल विभाजन के बाद हुए क्रांतिकारी आंदोलन से अरविन्द घोष का नाम जुड़ गया और अलीपुर बमकांड में उनके खिलाफ राजद्रोह का मामला चलाया गया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया। वे एक वर्ष तक अलीपुर जेल में रहे। जेल में उनका जीवन बदल गया और वे साधना एवं तप में जुट गए। अरविन्द घोष वहां श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ते थे और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करते थे। तेज-तर्रार वकील चितरंजन दास ने अदालत में उनका बचाव किया और अरविन्द बरी हो गए। जेल से बाहर आने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन से नहीं जुड़े। अरविन्द का मानना था कि समाज की प्रगति केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से नहीं, बल्कि मानसिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास से होती है। उनका विश्वास था कि स्वतंत्र भारत की नींव का आधार आध्यात्मिक ही होना चाहिए।
उनकी योग साधना का लक्ष्य केवल आध्यात्मिक मुक्ति नहीं, बल्कि पृथ्वी पर दिव्य जीवन की स्थापना था। अपनी योग शक्ति और साधना से उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा प्रदान की।
राजनीतिक जीवन से अलग होने के बाद अरविन्द घोष ने पांडिचेरी को ही अपनी कर्मभूमि और तपोभूमि बनाया। पांडिचेरी में उन्होंने अरविन्द आश्रम की स्थापना की तथा पूर्णकालिक आध्यात्मिक साधना, साहित्य लेखन और योग शिक्षण को अपनाया। उनकी योग साधना का लक्ष्य केवल आध्यात्मिक मुक्ति नहीं, बल्कि पृथ्वी पर दिव्य जीवन की स्थापना था। अपनी योग शक्ति और साधना से उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा प्रदान की। उनके मानवतावादी दृष्टिकोण और धर्म की संकुचित व्याख्या से बचने और आध्यात्मिक जीवन अपनाने की प्रेरणा ने बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित किया, भारतीय ऋषि परंपरा में उन्हें स्थान मिला और वे महर्षि कहलाए।
महर्षि अरविन्द ने ‘सर्वांग योग’ जैसी अद्वितीय साधना पद्धति का प्रतिपादन किया जिसका उद्देश्य है व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक - सभी पहलुओं का विकास करना, मन और बुद्धि से परे अति मानसिक स्तर पर पहुंचने के लिए प्रोत्साहित करना, पूर्ण क्षमता तक ले जाना। यह तभी संभव है जब साधक भगवान पर विश्वास और भरोसा रखता है और उनके आगे आत्मसमर्पण कर देता है। महर्षि अरविन्द का मानना था कि साधना के लिए एकांत में चले जाने या संसार का त्याग करने की आवश्यकता नहीं है। सारा जीवन ही योग है। साधना के रूप में योग आत्मपूर्णता की ओर एक व्यवस्थित प्रयास है जो अस्तित्व की छिपी हुई भावनाओं को अभिव्यक्त करता है। यह प्रयास कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति और अध्यात्म योग के समन्वय के रूप में देखा जा सकता है। ‘सर्वांग योग’ के विकास के क्रम में महर्षि अरविन्द ने जिन सात चरणों की व्याख्या की, वे हैं - शांति, शक्ति, ज्ञान, शरीर, कर्म, ब्रह्म प्राप्ति और सिद्धि। साधना चंचल मन को शांत करने से लेकर सिद्धि प्राप्ति - विराट के साथ एकात्म होने की प्रक्रिया है, जो सीमित को अनंत, लौकिक को कालातीत और अंतर्निहित को पारलौकिक से जोड़ती है।
वर्ष 1947 में भारतवर्ष को स्वतंत्रता मिलने पर महर्षि अरविन्द द्वारा दिए गए संदेश का सार था, ‘‘प्रत्येक राष्ट्र का एक जीवनकार्य होता है तथा भारत का भी ऐसा एक कार्य है और वह है पूरे विश्व को आध्यात्मिकता प्रदान करना।’’ महर्षि अरविन्द ने भारतीय शिक्षा चिन्तन में महत्वपूर्ण योगदान किया। उनके अनुसार, शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य व्यक्ति के सर्वांगीण विकास में सहायक होना तथा उसे उच्च आदर्शों के लिए प्रयोग हेतु सक्षम बनाना है। उनका मानना था कि प्रत्येक विद्यार्थी को उसकी क्षमता, अभिवृत्ति एवं योग्यता के अनुकूल शिक्षा दी जानी चाहिए। विद्यार्थी को अपनी प्रवृत्ति के अनुसार विकास के अवसर मिलने चाहिए। शिक्षण पद्धत्ति की उत्कृष्टता उपयुक्त शिक्षक पर ही निर्भर होती है। शिक्षक प्रशिक्षक नहीं है, वह तो सहायक एवं पथ प्रदर्शक है। वह केवल ज्ञान ही नहीं देता बल्कि ज्ञान प्राप्त करने की दिशा भी दिखलाता है।
महर्षि अरविन्द ने 5 दिसंबर 1950 को पांडिचेरी में नश्वर शरीर का त्याग कर दिया। उन्हें आश्रम में ही समाधि दी गई जहां आज भी लाखों लोग पहुंचकर उनके प्रति श्रद्धा निवेदित करते हैं। (युवराज फीचर्स)
-मोहन मंगलम