पढ़ाई से आगे की समझ : बच्चों के विकास में शुरुआती आकलन की भूमिका पर जोर

पढ़ाई से आगे की समझ : बच्चों के विकास में शुरुआती आकलन की भूमिका पर जोर
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सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : मनोवैज्ञानिक कल्याण को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता कार्यक्रमों, काउंसलिंग सेवाओं, चिकित्सीय हस्तक्षेपों और सामुदायिक सहभागिता पहलों के माध्यम से कार्यरत मानसिक स्वास्थ्य एवं वेलनेस संस्था Annantaa भावनात्मक कल्याण, मानसिक स्वास्थ्य और समग्र विकास को लेकर जागरूकता बढ़ाने की दिशा में लगातार प्रयासरत है। काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट एवं क्लिनिकल हिप्नोथेरेपिस्ट सुश्री माधुरी सरदा द्वारा स्थापित तथा को-फाउंडर और साइकोथेरेपिस्ट सुश्री विधि बंसल के साथ संचालित Annantaa ने ऐसी कई पहलें की हैं, जिनके माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता और विशेषज्ञ मार्गदर्शन को सामुदायिक एवं शैक्षणिक परिवेश तक पहुंचाया जा रहा है।

बच्चों के शुरुआती विकास में स्कूलों और शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका को ध्यान में रखते हुए, Annantaa शैक्षणिक संस्थानों के साथ मिलकर बच्चों की भावनात्मक, व्यवहारिक, विकासात्मक और सीखने से जुड़ी जरूरतों को लेकर जागरूकता बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। स्कूल-केंद्रित इन पहलों का उद्देश्य शिक्षकों और अभिभावकों के बीच बेहतर समझ विकसित करना है, ताकि वे शुरुआती संकेतों को पहचान सकें, बच्चों से जुड़ी चिंताओं को संवेदनशीलता के साथ समझ सकें और आवश्यकता पड़ने पर उचित पेशेवर सहायता ले सकें।

बच्चों के विकास और शैक्षणिक जागरूकता पर इसी निरंतर फोकस के तहत, Annantaa ने “अर्ली इनसाइट्स, ब्राइटर फ्यूचर्स: ए सेशन ऑन साइकोमेट्रिक असेसमेंट्स इन अ चाइल्ड्स ग्रोथ” विषय पर एक जागरूकता-केंद्रित इंटरैक्टिव सेशन आयोजित किया। इस सत्र में मनोवैज्ञानिकों और स्कूल लीडर्स ने बच्चों को केवल उनके शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर समझने के बजाय उनके व्यक्तित्व और विकास के विभिन्न पहलुओं को समझने की आवश्यकता पर चर्चा की। सत्र में सुश्री देबलीना बिस्वास नाग, डायरेक्टर, कैम्ब्रिज मॉन्टेसरी प्रीस्कूल एंड डेकेयर, न्यूटाउन, तथा सुश्री ऋतुपर्णा कोले, प्रिंसिपल एवं ओनर, यूरोकिड्स प्रीस्कूल बालीगंज और ककून डेकेयर एंड एक्टिविटी सेंटर, बालीगंज ने भाग लिया और छोटे बच्चों तथा शैक्षणिक परिवेश के साथ अपने अनुभवों एवं अवलोकनों को साझा किया।

शुरुआती जागरूकता की आवश्यकता को वैश्विक और भारतीय स्तर के महत्वपूर्ण आंकड़ों से भी रेखांकित किया गया। यूनिसेफ के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 240 मिलियन बच्चे, यानी हर 10 में से 1 बच्चा, किसी न किसी प्रकार की दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहा था। वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुमान के अनुसार, वैश्विक स्तर पर लगभग हर 100 में से 1 बच्चा ऑटिज्म से प्रभावित था। भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार, 0–6 वर्ष आयु वर्ग के 20,42,887 बच्चे दिव्यांगता के साथ दर्ज किए गए थे, जिनमें पश्चिम बंगाल के 1,32,405 बच्चे शामिल थे। यह उस आयु वर्ग में भारत के दिव्यांग बच्चों का 6.48 प्रतिशत था। पश्चिम बंगाल में कुल 20,17,406 दिव्यांग व्यक्तियों का भी आंकड़ा दर्ज किया गया था, जिनमें 0–6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चे 6.56 प्रतिशत थे।

कोलकाता से जुड़े आंकड़ों ने भी शिक्षकों के बीच शुरुआती जागरूकता की प्रासंगिकता को सामने रखा। ऑटिज्म रिसर्च में प्रकाशित 2017 के एक स्कूल-आधारित अध्ययन में कोलकाता के तीन बरो के 11,849 बच्चों को शामिल किया गया था। अध्ययन में ऑटिज्म से जुड़े लक्षणों की स्क्रीनिंग में निर्धारित सीमा से ऊपर पाए गए बच्चों का वेटेड अनुमान 3.54 प्रतिशत दर्ज किया गया, जबकि बाद के आकलन के आधार पर व्यापक ऑटिज्म स्पेक्ट्रम के लिए यह वेटेड अनुमान 0.23 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं ने इसे न्यूनतम स्तर का अनुमान बताया, विशेष रूप से इस तथ्य को देखते हुए कि कई बच्चे स्कूल व्यवस्था से बाहर थे। इसके अलावा, भारत में किए गए एक सिस्टेमैटिक रिव्यू में 6 अध्ययनों और 8,133 बच्चों को शामिल करते हुए विशिष्ट लर्निंग डिसऑर्डर्स की संयुक्त प्रसार दर 8 प्रतिशत आंकी गई। ये आंकड़े बच्चों के व्यवहार और सीखने के पैटर्न को समझने, उचित आकलन करने और समय पर आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।

सुश्री माधुरी सरदा, काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट एवं क्लिनिकल हिप्नोथेरेपिस्ट तथा Annantaa की फाउंडर, ने कहा,

“हर बच्चे का सीखने, संवाद करने और अपने आसपास की दुनिया के प्रति प्रतिक्रिया देने का तरीका अलग होता है। शुरुआती आकलन का उद्देश्य किसी बच्चे पर कोई लेबल लगाना नहीं, बल्कि उसकी व्यक्तिगत क्षमताओं और जरूरतों को समझना है, ताकि अभिभावक और शिक्षक अधिक जागरूकता के साथ उसका सहयोग कर सकें। जब किसी चिंता को शुरुआती स्तर पर पहचानकर संवेदनशीलता के साथ समझा जाता है, तो इससे बच्चे के लिए सही समय पर सही सपोर्ट सिस्टम तैयार करने में मदद मिल सकती है।”

सुश्री आत्रेयी चंद्रा, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट एवं एकेडमिक एक्सीलेंस कोऑर्डिनेटर, Annantaa, ने बताया,

“साइकोमेट्रिक असेसमेंट्स बच्चे की क्षमताओं, रुचियों और सीखने के पैटर्न के विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए व्यवस्थित जानकारी प्रदान कर सकते हैं। हालांकि, इन्हें बच्चे के समग्र संदर्भ को ध्यान में रखते हुए समझना आवश्यक है। समय के साथ विभिन्न पैटर्न को पहचानने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उनके अवलोकन, आवश्यकता पड़ने पर पेशेवर आकलन के साथ मिलकर, यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं कि बच्चों को उनकी व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप उचित सहायता मिल सके।”

अर्ली इनसाइट्स, ब्राइटर फ्यूचर्स के माध्यम से Annantaa ने बच्चों को शुरुआती स्तर पर समझने तथा उनकी व्यक्तिगत सीखने और विकास संबंधी जरूरतों के प्रति संवेदनशीलता के साथ प्रतिक्रिया देने के महत्व को रेखांकित किया। इस सत्र में उम्र के अनुरूप पेशेवर आकलन को किसी बच्चे को लेबल करने के बजाय उसे समझने और आवश्यक सहयोग प्रदान करने के एक माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया। साथ ही, शुरुआती पहचान को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में शुरुआती पहचान, निरंतर सहयोग और समावेशी शिक्षा पर दिए गए जोर से भी जोड़ा गया। Annantaa ने इस बात पर भी जोर दिया कि बच्चों को सही समय पर उचित सहायता सुनिश्चित करने के लिए शिक्षकों, अभिभावकों और योग्य पेशेवरों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण है।

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