मातृभाषा दिवस की विडंबना : चुनावी माहौल में बंगाल का गिरता राजनीतिक संवाद

फाइल फोटो
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कोलकाता : पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक माहौल लगातार गरमाता जा रहा है। नीतिगत बहसों और वैचारिक चर्चा की जगह अब नेताओं के बीच व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और तीखी बयानबाज़ी ने ले ली है। कभी तथ्य आधारित संवाद के लिए पहचानी जाने वाली बंगाल की राजनीति आज सतही और आक्रामक भाषा के कारण चर्चा में है। तृणमूल कांग्रेस, भाजपा, माकपा और कांग्रेस सभी दल एक-दूसरे पर सार्वजनिक बहस का स्तर गिराने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि आलोचकों का मानना है कि इस गिरावट के लिए सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर यह विरोधाभास और स्पष्ट दिखता है। वही बंगाल, जिसने रवींद्रनाथ ठाकुर और काजी नजरुल इस्लाम जैसे महान साहित्यकार दिए, आज तीखी राजनीतिक भाषा के कारण सुर्खियों में है। राज्य के संसदीय कार्य मंत्री शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने इस बदलाव को स्वीकार करते हुए इसे व्यापक सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा। उनके मुताबिक पहले वैचारिक आलोचना होती थी, अपमानजनक भाषा नहीं। उन्होंने कहा कि लोगों में सहनशीलता और धैर्य में गंभीर गिरावट आई है। नेताओं को याद रखना चाहिए कि आज बोले गए शब्द कल उल्टा पड़ सकते हैं। वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने कहा कि व्यक्तिगत आरोप ठोस आलोचना का स्थान ले रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने मौजूदा स्थिति को "अब तक का सबसे निम्न स्तर" बताया और अफसोस जताया कि वैचारिक प्रतिस्पर्धा की जगह व्यक्तिगत हमलों ने ले ली है। उन्होंने कहा कि इस गिरावट का एक प्रमुख कारण राजनीतिक नेताओं के बौद्धिक स्तर में कमी आना है। पहले नेता साहित्य, दर्शन और इतिहास पढ़ते थे। उनमें बौद्धिक अनुशासन और व्यापक दृष्टिकोण होता था। आज राजनीति तात्कालिक और सतही बातों तक ही सीमित है। मालूम हो कि बंगाल को कभी बी सी रॉय, ज्योति बसु, प्रणब मुखर्जी, प्रफुल्ल सेन, अजय मुखर्जी, सोमनाथ चटर्जी, सिद्धार्थ शंकर रे, इंद्रजीत गुप्ता और भूपेश गुप्ता जैसे प्रभावशाली वक्ताओं पर गर्व था, जो विचारधारा में एक दूसरे से काफी भिन्न थे, लेकिन बहस को नीति और संवैधानिक बुनियाद पर आधारित रखते थे, और कभी भी व्यक्तिगत द्वेष में नहीं बदलते थे। वहीं जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, कुछ जानकारों का मानना है कि अनिर्णायक मतदाताओं को लुभाने के लिए भाषा का लहजा नरम होता जाएगा, जबकि अन्य का मानना है कि जैसे-जैसे मुकाबला कड़ा होता जाएगा, हमले और तेज होते जाएंगे। इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस विडंबना से भरा हुआ है।


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