विपक्ष का दर्जा बचाने की जंग, अभिषेक का पत्र नहीं हुआ स्वीकार

कुणाल-असीमा के हाथों पत्र लेने से विधानसभा सचिवालय का इनकार
अभिषेक बनर्जी
अभिषेक बनर्जी
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कोलकाता : पार्टी में टूट-फूट लगभग तय है, यह बात शायद तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व समझ चुका है। इसलिए विधानसभा में कम से कम "मुख्य विपक्षी दल" का दर्जा और पार्टी का अस्तित्व बनाए रखने के लिए ममता बनर्जी की पार्टी पूरी कोशिश कर रही है।

इसी उद्देश्य से मंगलवार को तृणमूल के दो विधायक कुणाल घोष और असीमा पात्र एक नया पत्र लेकर विधानसभा पहुंचे। वे स्पीकर रथीन्द्र बोस की अनुपस्थिति में वह पत्र उनके सचिव को सौंपना चाहते थे, लेकिन आरोप है कि सचिव ने पत्र स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

दिलचस्प बात यह है कि इस पत्र के लेखक कोई और नहीं, बल्कि टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी स्वयं हैं। अभिषेक ने एक बार फिर विधानसभा अध्यक्ष को पत्र भेजकर शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने की मांग की है। सूत्रों के अनुसार, पत्र में उपनेता के रूप में नयना बंद्योपाध्याय और असीमा पात्र तथा मुख्य सचेतक के रूप में फिरहाद हकीम के नाम प्रस्तावित किए गए हैं।

अभिषेक ने अपने पत्र में 2001 से 2021 तक विधानसभा में अपनाई गई परंपराओं और पूर्व उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा है कि नेता प्रतिपक्ष का चयन हमेशा सबसे बड़े विपक्षी दल की सिफारिश पर होता रहा है। वहीं दूसरी ओर, “हस्ताक्षर कांड” को लेकर चल रही जांच ने राजनीतिक माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है।

आरोपों के अनुसार, विधायकों के हस्ताक्षर में गड़बड़ी की शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज हुई और पुलिस जांच शुरू कर दी गई है। कुणाल घोष ने दावा किया कि सोमवार को टीएमसी द्वारा जमा किए गए पत्र को सचिव ने स्वीकार किया था, लेकिन बाद में उन्हें विपक्ष का कोई भी पत्र नहीं लेने का निर्देश दिया गया।

टीएमसी का कहना है कि पत्र में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि विपक्ष के नेता का चयन सबसे बड़ा विपक्षी दल करता है, न कि व्यक्तिगत विधायक। हालांकि, इस मामले पर स्पीकर की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आयी है।

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