

सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : जीवन में भगवान की दिव्य लीला का अनुभव संत और गुरु कृपा से होता है।आजकल कुछ गुरु अपने को भगवान घोषित कर रहे हैं,जो कि गलत है। ठाकुर ,ठाकुर हैं और भक्त ,भक्त होता है। दोनों में गुण और स्वभाव में बहुत अंतर है।भगवान में सृष्टि की उत्पत्ति,पालन और संहार करने की क्षमता होती है पर संत-गुरु में नहीं।आपका मन सच्चा सुख (आनंद) खोजता है। सच्चा आनंद आपके भीतर विराजमान परमात्मा है। परमात्मा और आपका स्वरूप आनंद ही है। आनंद स्वरूप परमात्मा आपके भीतर बैठा है। ऐसा अनुभव करेंगे तो पराधीनता खत्म हो जाएगी।
संत-गुरु कृपा से हम भ्रम से निकलकर प्रभु की लीलाओं का अनुभव करते हैं। भक्त प्रह्लाद बचपन से भगवान की लीलाओं का दर्शन-अनुभव करते थे। सामान्य बच्चों की तरह पांच वर्ष के थे तब गुरुकुल में पढ़ने गये। असुरों का भी गुरुकुल था पर वहां आसुरी शिक्षा दी जाती थी। तंत्र-मंत्र की शिक्षा दी जाती थी। जहां शक्ति दिखती है वहां साधना होती है। साधना से शक्ति आती है। असुरों के गुरु शुक्राचार्य के गुरुकुल में प्रह्लाद की शिक्षा हुई।प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यपु ने एक दिन पूछा, बेटा बताओ अब तक क्या पढ़ा? प्रह्लाद ने कहा, अगर यह भगवान की कृपा से मिला है तो उनका भजन करना चाहिए।
ये बातें संगीत कला मंदिर व संगीत कला मंदिर ट्रस्ट के तत्वावधान में श्रीमद्भागवत कथा के अंतर्गत भक्त प्रह्लालाद चरित्र पर प्रवचन करते हुए परम पूज्य परमहंस स्वामी गिरिशानंद महाराज ने संगीत कला मंदिर सभागार में कही। इस मौके पर अरविन्द नेवर, मंजू नेवर, विनोद माहेश्वरी, जयश्री मोहता, शीला झुनझुनवाला, मुरारीलाल दीवान, बीएसएफ के कमांडेट मनोज राय ,शकुंतला दीवान, राम अवतार केडिया, संगीता राय,प्रभात पंसारी,
रामकथावाचक पुरुषोत्तम तिवारी, महावीर प्रसाद रावत सहित अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे।