SIR प्रक्रिया पर सवाल, चार मौतों से बंगाल की राजनीति गरमायी

राजनीतिक दलों ने शुरू की बयानबाजी

SIR प्रक्रिया पर सवाल, चार मौतों से बंगाल की राजनीति गरमायी
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केडी पार्थ, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : पश्चिम बंगाल के अलग-अलग जिलों में एक ही दिन चार लोगों की मौत के लिए SIR, बीएलओ प्रणाली और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक तनाव और गहरा गया है। तृणमूल कांग्रेस की ओर से लगाए गए इन आरोपों को बीजेपी ने सिरे से खारिज करते हुए इसे “राजनीतिक बयानबाजी” बताया है।

SIR नोटिस से मानसिक दबाव का आरोप

कूचबिहार जिले के सिताई इलाके में एक शिक्षक की मौत के बाद परिवार और तृणमूल ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में नाम और पारिवारिक विवरण को लेकर आयी गड़बड़ियों ने मानसिक तनाव बढ़ाया। परिजनों का कहना है कि ड्राफ्ट लिस्ट में त्रुटियों और सुनवाई को लेकर अनिश्चितता से परिवार भय में था।

चुनाव आयोग पर सीधा हमला

घटना के बाद तृणमूल सांसद जगदीश चंद्र बसुनिया ने मृतक के घर जाकर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया में लचीलापन नहीं होने से आम लोग डर के माहौल में जी रहे हैं और इसके गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं।

आरोप बेबुनियाद

बीजेपी नेताओं ने तृणमूल के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि हर मौत को SIR से जोड़ना गलत और गैर-जिम्मेदाराना है। पार्टी का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया को बदनाम करने के लिए भावनात्मक मुद्दों का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है।

अन्य जिलों में भी मौतें

जलपाईगुड़ी जिले में एक टोटो चालक और एक ड्राइवर की मौत, वहीं उत्तर 24 परगना में एक बुजुर्ग महिला की तबीयत बिगड़ने के बाद मौत को भी तृणमूल ने SIR सुनवाई और दस्तावेजी दबाव से जोड़ा है। पार्टी का दावा है कि बार-बार सुनवाई, दस्तावेजों की मांग और बीएलओ स्तर की गड़बड़ियां लोगों में डर पैदा कर रही हैं।

बीएलओ और प्रशासन की भूमिका पर सवाल

तृणमूल नेताओं ने कहा कि बीएलओ स्तर पर हुई छोटी-छोटी गलतियां समय पर सुधारी जा सकती थीं, लेकिन प्रक्रिया की जटिलता ने आम नागरिकों की परेशानी बढ़ाई। प्रशासन की ओर से इन मामलों पर फिलहाल कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

SIR बना सियासी संघर्ष का केंद्र

चुनाव से पहले SIR अब सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। जहां तृणमूल इसे “जनविरोधी” बता रही है, वहीं बीजेपी इसे मतदाता सूची की शुद्धता के लिए जरूरी कदम बता रही है।

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