सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : मर्चेंट्स’ चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (MCCI) ने ‘Women in Cinema: Onscreen and Behind the Camera’ विषय पर एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया। इस सत्र में प्रख्यात अभिनेत्री एवं फिल्म निर्माता ऋतुपर्णा सेनगुप्ता तथा प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक, लेखक एवं अभिनेता शिबोप्रसाद मुखर्जी के बीच एक खुला और प्रेरणादायक संवाद हुआ।
सभा को संबोधित करते हुए ऋतुपर्णा सेनगुप्ता ने सिनेमा में चाहे वह परदे पर हो या कैमरे के पीछे महिलाओं को झेलनी पड़ने वाली चुनौतियों पर खुलकर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि महिलाओं की कठिनाइयाँ केवल पेशे तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि पारिवारिक स्तर पर भी उन्हें लंबे समय से चली आ रही सामाजिक वर्जनाओं और मानसिक बाधाओं का सामना करना पड़ा है। अतीत को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि जहाँ पहले का समय अंधकार से भरा था, वहीं आज महिलाओं के लिए सिनेमा में नई रोशनी और अवसर दिखाई दे रहे हैं।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पूर्व के वर्षों में महिलाओं के रचनात्मक योगदान को पहचान मिलना अत्यंत कठिन था। लंबे संघर्ष और निरंतर प्रयासों के बाद आज महिलाएँ सिनेमा जगत में पुरुषों के साथ समान स्तर पर कार्य कर रही हैं।
अपने संबोधन में शिबोप्रसाद मुखर्जी ने अपने व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में महिलाओं की निर्णायक भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी पहली फिल्म के निर्माण का साहसिक निर्णय श्रीमती ऋतुपर्णा सेनगुप्ता ने अपनी सहयोगी नंदिता रॉय के साथ मिलकर लिया था। उन्होंने यह भी कहा कि सिनेमा उद्योग में महिलाओं का योगदान हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। उदाहरणस्वरूप, इस वर्ष की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म “धुरंधर” का निर्माण ज्योति देशपांडे द्वारा किया जाना, कैमरे के पीछे महिलाओं के नेतृत्व को सशक्त रूप से दर्शाता है।
कार्यक्रम की शुरुआत में अपने स्वागत भाषण में प्रीति ए. सुरेका, अध्यक्ष, MCCI ने कहा कि जब भी महिलाओं को परदे पर या कैमरे के पीछे अवसर मिले हैं या उन्होंने स्वयं अपना मार्ग बनाया है तब भारतीय सिनेमा में सार्थक परिवर्तन देखने को मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि महिला फिल्मकार केवल महिलाओं की कहानियाँ ही नहीं कहतीं, बल्कि उन्होंने भारतीय सिनेमा की कथा-भाषा और रचनात्मक दृष्टि को व्यापक बनाया है।
जिनिया सेन, पटकथा लेखिका, ने भारतीय सिनेमा में महिलाओं के ऐतिहासिक संघर्षों पर प्रकाश डाला। उन्होंने माना कि समय के साथ महिलाओं को सम्मान और पहचान अवश्य मिली है, किंतु अब भी कई अंतराल शेष हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आज महिला निर्देशकों को पहले की तुलना में अधिक मान्यता मिल रही है और भारतीय फिल्म उद्योग में कई उत्कृष्ट महिला फिल्मकार सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। यह कार्यक्रम उपलब्धियों के उत्सव, वर्तमान चुनौतियों के आत्ममंथन तथा साझेदारी, मेंटरशिप, वित्तीय सहयोग और बेहतर दृश्यता के माध्यम से सिनेमा में महिलाओं को सशक्त बनाने पर सार्थक संवाद के लिए एक महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ।