

कोलकाता : पश्चिम बंगाल में मच्छरजनित बीमारियां पिछले एक दशक से स्वास्थ्य विभाग के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई हैं। चिकित्सकों के अनुसार, वर्ष 2014 से 2024 के बीच राज्य में एक लाख से अधिक लोग मच्छरजनित बीमारियों की चपेट में आए हैं।
इनमें डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां प्रमुख हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने संक्रमण की रोकथाम के लिए मच्छरों के प्रजनन स्थलों पर नियंत्रण और लोगों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया है।
हर साल सामने आते रहे संक्रमण के मामले
चिकित्सकीय रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले दस वर्षों में राज्य में मच्छरजनित बीमारियों के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। खासकर शहरी इलाकों में स्थिति अधिक चिंताजनक बताई गई है। विशेषज्ञों की मानें तो , जलजमाव, खुले में कचरा और साफ-सफाई की कमी मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल माहौल तैयार करती है। इसके कारण बारिश के मौसम में संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है।
डेंगू-मलेरिया के साथ चिकनगुनिया भी चिंता
डॉक्टरों ने बताया कि राज्य में मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों में डेंगू और मलेरिया के अलावा चिकनगुनिया के मामले भी सामने आते रहे हैं। लगातार संक्रमण के मामलों को देखते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बीमारी की जल्द पहचान और समय पर इलाज को महत्वपूर्ण बताया है।
साथ ही मच्छरों की संख्या नियंत्रित करने के लिए नियमित रूप से फॉगिंग, लार्वा नियंत्रण और प्रभावित इलाकों की निगरानी पर जोर दिया है।
जलजमाव और खराब प्रबंधन से बढ़ता खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार, मच्छरजनित बीमारियों पर प्रभावी नियंत्रण के लिए केवल अस्पतालों में इलाज पर्याप्त नहीं है। इसके लिए नगर निकायों और स्वास्थ्य विभाग को मिलकर जलजमाव खत्म करने, कचरा प्रबंधन सुधारने और मच्छरों के प्रजनन स्थलों को नष्ट करने पर ध्यान देना होगा।
लोगों को भी घरों और आसपास पानी जमा नहीं होने देने तथा मच्छरों से बचाव के उपाय अपनाने के लिए जागरूक करना जरूरी है। चिकित्सकों का कहना है कि लगातार निगरानी और प्रभावी वेक्टर-कंट्रोल उपायों से संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।