कच्चे जूट की 12 हजार रुपये प्रति क्विंटल पहुंची, जूट उद्योग गहरे संकट में

जूट श्रमिकों की रोजी-रोटी पर पड़ सकता है असर केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की
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रामबालक, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : कच्चे जूट की कीमतें 12,000 रुपये प्रति क्विंटल के पार पहुंचने के साथ ही देश का जूट उद्योग अभूतपूर्व संकट में फंस गया है। कच्चे माल की तीव्र कमी और कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि के कारण कई जूट मिलों ने उत्पादन घटा दिया है, जबकि अनेक मिलों में शिफ्ट स्थगित या बंद की जा रही हैं। इसका सीधा असर जूट श्रमिकों की रोजी-रोटी पर पड़ रहा है और जूट उत्पादक इलाकों में आर्थिक-सामाजिक तनाव तेजी से बढ़ रहा है। राज्यसभा सांसद ऋतब्रत बनर्जी ने इस गंभीर स्थिति को लेकर केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि जूट क्षेत्र में मौजूदा हालात किसी एक मौसम या प्राकृतिक कारणों से नहीं बने हैं, बल्कि यह पिछले कई वर्षों की नीतिगत विफलताओं का नतीजा है।

पत्र में सांसद ने स्पष्ट किया कि कम कीमत वाले वर्षों में न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत जूट की खरीद तो की गई, लेकिन उसे किसी पारदर्शी बफर या स्थिरीकरण व्यवस्था से नहीं जोड़ा गया। न तो यह तय किया गया कि कितना जूट भंडारित किया जाएगा, न ही यह स्पष्ट किया गया कि संकट के समय उसे बाजार में कब और कैसे उतारा जाएगा। नतीजतन, किसानों से तो जूट खरीदा गया, लेकिन आज जब बाजार में कमी है, वही व्यवस्था कीमतों को नियंत्रित करने में पूरी तरह असफल साबित हो रही है।

संकट को और गंभीर बनाने वाला कारण सरकारी जूट बैग आदेशों की अनिश्चित और असमान योजना रही है। बीते वर्षों में आदेशों में कटौती और देरी के चलते मिलों ने उत्पादन कम किया और किसानों से जूट की खरीद घटाई। अब जब कुछ आदेश एक साथ आए, तो मिलों को मजबूरी में घबराहट में खरीद करनी पड़ी, जिससे कीमतें असामान्य स्तर तक पहुंच गईं। आज स्थिति यह है कि कच्चे जूट की ऊंची कीमतों ने मिलों की कार्यशील पूंजी पर भारी दबाव डाल दिया है। हजारों मजदूरों को कम काम के दिन मिल रहे हैं या पूरी तरह बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर किसानों के सामने भी अनिश्चितता बनी हुई है—यह भरोसा नहीं कि मौजूदा ऊंची कीमतें टिकाऊ नीति समर्थन का परिणाम है या केवल अस्थायी कमी का।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने तुरंत कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो जूट उद्योग को दीर्घकालिक संरचनात्मक क्षति हो सकती है। सांसद ने सरकार से कच्चे जूट के लिए एक स्पष्ट स्थिरीकरण/बफर नीति घोषित करने, PCSO मांग को साल भर समान रूप से बांटने और एमएसपी खरीद व्यवस्था को और मजबूत करने की माग की है। जूट उद्योग केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि लाखों किसानों और श्रमिकों की आजीविका का आधार है।

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