पूर्वोत्तर भारत में हिंदी शिक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण में राजस्थानी मारवाड़ी-जैन समुदाय की अहम भूमिका

स्वर्गीय हीरालाल जैन बच्छावत‌ की तस्वीर
स्वर्गीय हीरालाल जैन बच्छावत‌ की तस्वीर
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कोलकाता : स्वतंत्रता के बाद देश में आर्थिक चुनौतियों के चलते राजस्थान के अनेक लोग रोजगार की तलाश में असम और त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में आकर बस गए। राजस्थानी मारवाड़ी और जैन समुदाय ने अपने सौम्य व्यवहार, अनुकूलन क्षमता और सामाजिक समरसता के माध्यम से स्थानीय समाज के साथ मजबूत संबंध स्थापित किए। उन्होंने जहाँ एक ओर स्थानीय संस्कृति और परंपराओं को अपनाया, वहीं अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी सहेजकर रखा, जिससे राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समन्वय को बल मिला। इन समुदायों ने व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ शिक्षा, सामाजिक कल्याण और मानव संसाधन विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। प्राकृतिक आपदाओं के समय सहायता प्रदान करना तथा अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना उनके सामाजिक उत्तरदायित्व को दर्शाती है। महिला सशक्तिकरण और वंचित वर्गों के उत्थान में भी उनकी सक्रिय भागीदारी उल्लेखनीय रही है। कोलकाता के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता स्वर्गीय फुंसराज बच्छावत के पुत्र, स्वर्गीय हीरालाल जैन बच्छावत का योगदान विशेष रूप से सराहनीय है। उन्होंने त्रिपुरा के अगरतला में “हिंदी जूनियर हाई स्कूल ट्रस्ट” तथा “महावीर धार्मिक ट्रस्ट” की स्थापना की, जो शिक्षा और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। त्रिपुरा सरकार ने उनके सम्मान में विद्यालय के सामने की सड़क का नाम “हीरालाल जैन बच्छावत रोड” रखा, जो त्रिपुरा में किसी राजस्थानी व्यक्तित्व के नाम पर रखी गई पहली सड़क मानी जाती है। 1960 में स्थापित हिंदी जूनियर हाई स्कूल त्रिपुरा का पहला हिंदी माध्यम सह-शिक्षा विद्यालय बना। इसने हिंदी भाषी परिवारों की शिक्षा संबंधी समस्याओं का समाधान किया। आज भी यह संस्थान सभी वर्गों, विशेषकर वंचित समुदायों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करते हुए उत्तर-पूर्व में हिंदी भाषा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वर्तमान में हिंदी जूनियर हाई स्कूल ट्रस्ट के अध्यक्ष तरुण बच्छावत जैन हैं।

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