स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि पर पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि, बताया भारत की वैश्विक पहचान का शिल्पकार

मोदी ने कहा विवेकानंद का योगदान अतुलनीय
स्वामी विवेकानंद
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दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को स्वामी विवेकानंद की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके योगदान को स्मरण किया। अपने विचारों, आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्र निर्माण के संदेश से उन्होंने भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को नई दिशा दी। युवाओं को आत्मविश्वास, सेवा, चरित्र निर्माण और राष्ट्रभक्ति का संदेश देने वाले स्वामी विवेकानंद आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक परंपरा और राष्ट्रीय चेतना को विश्व स्तर पर नई पहचान दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री ने उनके विचारों और आदर्शों को आज भी देशवासियों, विशेषकर युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बताया।

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने 4 जुलाई 1902 को महाप्रयाण किया। अपने अल्प जीवनकाल में उन्होंने भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक मूल्यों का संदेश दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाया तथा भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर नई प्रतिष्ठा दिलाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वामी विवेकानंद के निर्वाण दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका जीवन और विचार आज भी देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर साझा किए गए संदेश में कहा कि भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और राष्ट्रभावना को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने में स्वामी विवेकानंद का योगदान अद्वितीय रहा है।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि स्वामी विवेकानंद की तेजस्वी सोच और प्रेरक शिक्षाएं आज भी करोड़ों लोगों, विशेषकर युवाओं, को सही दिशा दिखा रही हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि स्वामी जी के आध्यात्मिक आदर्श और संदेश विकसित भारत के निर्माण के संकल्प को साकार करने में देशवासियों को लगातार नई ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करते रहेंगे। स्वामी विवेकानंद का जन्म नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में हुआ था। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की और वर्ष 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण से पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। अपने संबोधन में उन्होंने मानव सेवा को ही ईश्वर सेवा बताते हुए समाज कल्याण और मानवता के मूल्यों पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि मानव सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।

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