गुंडा दमन कानून पर विपक्ष का विरोध तेज

नए कानून को बताया विरोध की 'आवाज दबाने का हथियार'
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कोलकाता : राज्य में सोमवार से लागू हुए 'पश्चिम बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी सोशल एक्टिविटीज एक्ट, 2026' (गुंडा दमन कानून) को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। तृणमूल कांग्रेस, माकपा और कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि भाजपा सरकार इस कानून का इस्तेमाल संगठित अपराध पर अंकुश लगाने के बजाय राजनीतिक विरोधियों और लोकतांत्रिक आंदोलनों को दबाने के लिए करेगी। विपक्षी दलों ने कानून के खिलाफ आंदोलन और कानूनी लड़ाई दोनों के संकेत दिए हैं।

विपक्ष की मुख्य आपत्ति कानून के उस प्रावधान को लेकर है, जिसके तहत किसी व्यक्ति के सार्वजनिक शांति भंग करने या कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बनने की आशंका मात्र के आधार पर पुलिस उसे बिना मुकदमा चलाए अधिकतम एक वर्ष तक हिरासत में रख सकती है। विपक्ष का कहना है कि इस प्रावधान के दुरुपयोग की आशंका सबसे अधिक है।

कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने इसे "गुंडा दमन कानून नहीं, बल्कि दमनकारी कानून" बताते हुए कहा कि इसे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। तृणमूल प्रवक्ता कुणाल घोष ने आरोप लगाया कि नए कानून में आरोपी के कानूनी और न्यायिक अधिकारों को कमजोर किया गया है। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को केवल आशंका के आधार पर हिरासत में लिया जाएगा तो इसका इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को परेशान करने के लिए किया जा सकता है।

माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम और वरिष्ठ नेता सुजन चक्रवर्ती ने भी कानून का विरोध करते हुए इसे लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए खतरा बताया। वहीं, माकपा नेता एवं अधिवक्ता सब्यसाची चट्टोपाध्याय ने इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है।

हालांकि, राज्य सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि इस कानून का उद्देश्य संगठित अपराध, हिंसा, वसूली, सरकारी एवं निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तथा समाजविरोधी गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना है। सरकार का दावा है कि कानून का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा और इसका प्रयोग केवल गंभीर आपराधिक गतिविधियों से निपटने के लिए किया जाएगा।

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