

कोलकाता : सॉल्टलेक स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ होम्योपैथी (NIH) में अत्याधुनिक मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर की शुरुआत की गई है। संस्थान में अब जरूरत पड़ने पर मरीज की सर्जरी एलोपैथी विशेषज्ञों की देखरेख में की जाएगी, जबकि ऑपरेशन के बाद की देखभाल में होम्योपैथिक दवाओं के इस्तेमाल का अध्ययन किया जाएगा।
संस्थान का उद्देश्य यह पता लगाना है कि पोस्ट-ऑपरेटिव अवधि में होम्योपैथी का मरीज के दर्द, घाव भरने और रिकवरी पर क्या प्रभाव पड़ता है।
जरूरत पड़ने पर बाहर रेफर नहीं होंगे मरीज
NIH के निदेशक प्रलय शर्मा के अनुसार, संस्थान की ओपीडी में प्रतिदिन बड़ी संख्या में मरीज पहुंचते हैं। यदि किसी मरीज की बीमारी में सर्जरी आवश्यक है, तो उसे केवल होम्योपैथिक दवाओं पर निर्भर रखने के बजाय जरूरी सर्जिकल उपचार कराया जाएगा।
ऑपरेशन के दौरान सर्जन, एनेस्थेटिस्ट और जरूरत पड़ने पर कार्डियोलॉजिस्ट जैसे एलोपैथी विशेषज्ञों की भूमिका होगी। संस्थान की योजना है कि ऐसे मरीजों को सर्जरी के लिए बाहर रेफर करने के बजाय NIH में ही उपचार की समुचित व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए।
पोस्ट-ऑपरेटिव रिकवरी पर होगा क्लिनिकल रिसर्च
ऑपरेशन के बाद मरीजों की देखभाल में होम्योपैथिक दवाओं को शामिल किया जाएगा। इस दौरान मरीज के दर्द, घाव भरने की गति और समग्र रिकवरी जैसे पहलुओं पर नजर रखी जाएगी। इन परिणामों का वैज्ञानिक तरीके से क्लिनिकल रिसर्च के माध्यम से मूल्यांकन किया जाएगा।
संस्थान का कहना है कि इस प्रक्रिया से यह समझने में मदद मिलेगी कि सर्जरी के बाद होम्योपैथी से मरीजों को कोई अतिरिक्त लाभ मिलता है या नहीं। हालांकि, इसके प्रभाव और उपयोगिता को लेकर निष्कर्ष वैज्ञानिक अध्ययन के परिणाम आने के बाद ही निकाला जाएगा।
BHMS छात्रों को मिलेगा व्यावहारिक अनुभव
NIH में बैचलर ऑफ होम्योपैथी मेडिसिन एंड सर्जरी (BHMS) पाठ्यक्रम भी संचालित होता है। निदेशक प्रलय शर्मा के मुताबिक, मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर के जरिए छात्रों को यह समझने का अवसर मिलेगा कि किन परिस्थितियों में सर्जरी आवश्यक होती है और किन मामलों में दवाओं के माध्यम से उपचार किया जा सकता है।
संस्थान ने यह भी कहा कि होम्योपैथिक दवाओं में मूल पदार्थ को बार-बार घोलकर अत्यधिक पतला किया जाता है। इसी विशेषता को ध्यान में रखते हुए ऑपरेशन के बाद इनके संभावित प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा। मॉड्यूलर ओटी के शुरू होने से NIH में सर्जिकल उपचार और उसके बाद की देखभाल को शोध के दायरे में लाने की दिशा में नई पहल शुरू हुई है।