hindustan club
कोलकाता सिटी
हिन्दुस्तान क्लब में अभद्रता : कहीं ज्यादा, कहीं कम
चुनाव जीतने की होड़ में कहीं क्लब की गरिमा न हार जाए
सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता :
हिन्दुस्तान क्लब को उसके सदस्य केवल एक क्लब नहीं, बल्कि अपना दूसरा घर मानते हैं। वर्षों से यह संस्था सामाजिक मेल-जोल, सौहार्द और आपसी सम्मान की पहचान रही है लेकिन इस बार चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही माहौल कुछ ऐसा बनता दिखाई दे रहा है, जिसने क्लब की गरिमा और परंपराओं को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।चुनावी मुकाबला होना स्वाभाविक है। विचारों का मतभेद भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन इस बार जिस तरह की भाषा, व्यवहार और व्यक्तिगत टिप्पणियों की चर्चा सामने आ रही है, वह निश्चित रूप से चिंताजनक है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि चुनावी प्रतिस्पर्धा में बड़े-छोटे का लिहाज और आपसी सम्मान की मर्यादा भी कहीं पीछे छूटती जा रही है।कुछ वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि क्लब के ऑनररी चुनाव अधिकारी के स्तर से भी इस्तीफे की बात सामने आने लगी है। यदि चुनाव कराने वाले अधिकारी ही असहज स्थिति महसूस करने लगें, तो यह सभी पक्षों के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि पिछली बैठकों में जैसे पास्ट प्रेसिडेंट्स मीट तथा एडवाइजरी मीटिंग में सवाल जवाब में संतोषजनक जवाब दिया गया था। साथ ही आचार-व्यवहार और चुनावी मर्यादा को लेकर कुछ सीमाएं निर्धारित की गई थीं। इसके बावजूद यदि विवाद लगातार बढ़ रहा है, तो यह समय सभी पक्षों को रुककर सोचने का है।ऐसे माहौल में
सन्मार्ग
का सुझाव है कि चुनाव प्रचार को मतदान से पांच दिन पहले रोक दिया जाए। इसके बाद यदि कोई सदस्य प्रचार करता है, तो उसके विरुद्ध क्लब के नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाए। इससे अंतिम दिनों में बढ़ने वाले तनाव और अनावश्यक विवाद को कम किया जा सकता है। चुनाव जीतना महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन हिन्दुस्तान क्लब की गरिमा, रिश्ते और वर्षों पुरानी परंपरा उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। चुनाव समाप्त हो जाएगा, परिणाम भी आ जाएगा लेकिन सदस्यों के बीच संबंध और क्लब की प्रतिष्ठा लंबे समय तक बनी रहने वाली है, इस पर ध्यान देना जरूरी है।

