

जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता कोलकाता : एक नाबालिक बच्ची के साथ बलात्कार के एक मामले में हाई कोर्ट ने सजायाफ़्ता कैदी की अपील को खारिज कर दिया। अलबत्ता सजा की मियाद में डेढ़ साल की कटौती जरूर कर दी। हाई कोर्ट के जस्टिस राजाशेखर मंथा और जस्टिस अनुज सिंह के डिवीजन बेंच ने यह आदेश दिया है। अलीपुर के सेशन कोर्ट ने 15 साल जेल की सजा के साथ ही 30 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया था। डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा है कि सारे तथ्यों और दस्तावेजों पर गौर करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि बलात्कार के आरोप के मामले में शक की कोई गुंजाइश नहीं है। जहां तक सजा कि मियाद का सवाल है तो इस मामले में न्यायिक विचार करने की गुंजाइश बनती है। डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा है अधिकतम साढ़े 13 साल की सजा अपराध की गंभीरता की तुलना में पर्याप्त है। बरूईपुर के जेल के सुपर की रिपोर्ट के मुताबिक पेटीशनर को 2016 में 14 मार्च को गिरफ्तार किया गया था और उसके बाद से उसे जमानत पर रिहा नहीं किया गया। अगर जेल के नियमानुसार मिली छुट्टियों को जोड़ दे तो पेटीशनर 10 साल से अधिक की सजा भुगत चुका है। जेल में पेटीशनर का आचरण संतोष जनक रहा है और उसका कोई आपराधिक रिकार्ड भी नहीं है। एडवोकेट अमृता पांडे ने बताया कि डिवीजन बेंच ने कहा है कि वह ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा में कोई दखल नहीं दे रहा है। 10 साल और 5 साल जेल की सुनाई सजा एक साथ चलेगी। पेटीशनर ने 12 वर्ष की एक बच्ची के साथ बलात्कार किया था और इसकी रिपोर्ट चेतला थाने में दर्ज कराई गई थी।