

जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता कोलकाता : फेसबुक पर भी जातिसूचक टिप्पणी करने से मिलती है सजा। हाई कोर्ट के जस्टिस उदय कुमार ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। जस्टिस कुमार ने अलीपुर कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए कार्रवाई की जाने का आदेश दिया है। जस्टिस कुमार ने आदेश दिया है कि इन आपराधिक पोस्ट और डिजिटल फुटप्रिंट की पहचान करने के लिए फोरेंसिक कर्मचारियों को नियुक्त किया जाए। जस्टिस कुमार ने कहा है कि सीआरपीसी की उपयुक्त धारा के तहत तीन माह के अंदर इस मामले की रिपोर्ट दाखिल की जाए। एडवोकेट अमृता पांडे ने यह जानकारी देते हुए बताया कि फेसबुक से तथ्य नहीं मिलने का हवाला देते हुए पुलिस ने मामले में फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दिया था। जस्टिस उदय कुमार ने कहा कि जब स्क्रीनशॉट और लिंक उपलब्ध है, बयान भी दर्ज कराया जा चुका है, ऐसे में फेसबुक से तथ्य नहीं मिलने का हवाला देते हुए पुलिस मामले को दाखिल दफ्तर नहीं कर सकती है। अलीपुर कोर्ट ने इस मामले को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि पेटीशनर की तरफ से दायर तीन मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई पर इस मामले में कोई चार्जशीट नहीं है। पेटीशनर ने बेहला थाने में एफआईआर दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि रबीउल इस्लाम और सायन दत्त ने उसकी जाति धर्म और परिवार के लोगों पर अशालीन टिप्पणी करते हुए फेसबुक पर पोस्ट किया था। अलीपुर कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की गई थी।