

जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता कोलकाता : हाई कोर्ट की जस्टिस अमृता सिन्हा ने अपने एक आदेश में कहा है कि विकलांगता प्रमाण पत्र में दर्ज विकलांगता की मात्रा में बदलाव नहीं किया जा सकता है। पेटीशनर के एमबीबीएस में दाखिला लेने के एक आवेदन को इसी आधार पर खारिज कर दिया गया था। उसे NEET 26 में दूसरी बार के प्रयास के बाद सफलता मिली थी और वह गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज के एमबीबीएस में दाखिला लेना चाह रहा था। जस्टिस सिन्हा ने उसे दाखिला देने का आदेश दिया है। इसके साथ ही कहा है कि नए सिरे से विकलांगता प्रमाण पत्र दिया जाए। एडवोकेट अमृता पांडे ने बताया की रशीद अख्तर हुसैन ने पर्सन्स विद बेंचमार्क डिसेबिलिटीज कोटा के तहत दाखिले के लिए आवेदन किया था। इस्लामपुर के सब डिविजनल हॉस्पिटल में ने सितंब में उसे यूनिक डिसेबिलिटी आईडी जारी किया था और उसकी वैधता 2027 की 19 जनवरी तक है। गाइडलाइन के मुताबिक इस श्रेणी के लोगों को दाखिले के लिए मेडिकल असेसमेंट बोर्ड से डिसेबिलिटी सर्टिफिकेट लेना पड़ता है। मेडिकल असेसमेंट बोर्ड ने उसकी विकलांगता की मात्रा को घटकर के 32 कर दिया। इस तरह वह बेंचमार्क डिसेबिलिटी कोटा से बाहर हो गया। बोर्ड के मुताबिक को पूरी तरह फिट था और उसे किसी कृत्रिम सहायक की जरूरत नहीं थी। जस्टिस सिन्हा ने अपने आदेश में कहा है डिसेबिलिटी आईडी कार्ड सामाजिक न्याय मंत्रालय की तरफ से जारी किया गया था। इसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है।