

जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : हाई कोर्ट की जस्टिस शंपा दत्त (पाल) ने दाखिले के एक मामले में दखल देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर इस मामले में हाई कोर्ट दखल देता है तो छात्र-छात्राओं के बीच एक गलत संदेश जाएगा। पीटिशनर आईआईएम का एक छात्र है और उसने सेकंड इअर में प्रमोट करने के लिए पीटिशन दायर किया था। जस्टिस दत्त ने उपरोक्त टिप्पणी करते हुए पीटिशन को खारिज कर दिया।
जस्टिस दत्त ने कहा कि संस्थान ही वो स्थान हैं जो छात्र-छात्राओं की बेहतरी के बारे में सोच सकते हैं। अभिभावक अगर दखल देते हैं तो उनका रवैया सहयोगात्मक होना चाहिए। उन्हें संस्थान के साथ टकराव में नहीं जाना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि सहानुभूति संस्थान के नियम कानून पर भारी साबित होने लगे। एडवोकेट अमृता पांडे ने यह जानकारी देते हुए बताया कि पीटिशनर फर्स्ट इअर का छात्र है। उसे सेकंड इअर में प्रमोट नहीं किया गया। उसकी दलील थी कि उसके ग्रेड को गलत तरीके से 4.2 से घटा कर 3.7 कर दिया गया। इस वजह से वह सेकंड इअर में प्रमोट नहीं हो सका। वह सिजोफ्रेनिया का मरीज है। हालांकि उसकी तरफ से दिए गए मेडिकल सर्टिफिकेट में कहा गया है कि उसकी मानसिक स्थिति नियंत्रण में है। वायरल फीवर और छोटी मोटी बीमारियों के अलावा और कुछ नहीं है। सुनवायी के दौरान कहा गया कि फर्स्ट इअर में वह कुछ परीक्षाओं में हॉस्पिटल में भर्ती होने और बीमार होने के कारण हिस्सा नहीं ले पाया था। उसकी हाजिरी भी फर्स्ट इअर में कम थी। इसके बावजूद सेकंड इअर में जाने के लिए बेकरार था। संस्थान ने फर्स्ट इअर का कोर्स दोबारा करने के लिए कहा था। उसकी तरफ से दायर पीटिशन में कहा गया था कि उसे सेकंड इअर में प्रमोट करने के लिए आदेश दिया जाए। जस्टिस शंपा दत्त (पाल) ने अपने आदेश में कहा है कि अगर पुवर ग्रेड और उपयुुक्त हाजिरी के बगैर अगर डिग्री प्रदान कर दी जाती है तो इससे छात्र-छात्राओं के बीच एक गलत संदेश जाएगा।