गैरइरादतन हत्या के मामले में उम्रकैद क्यों

खारिज किया सेशन जज का फैसला
गैरइरादतन हत्या के मामले में उम्रकैद क्यों
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जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : यह मामला गैरइरादतन हत्या का है। इसे हत्या का दर्जा नहीं दिया जा सकता है। इसमें अधिकतम सजा दस साल की है और अभियुक्त पीटिशनर पिछले 13 साल से जेल की सजा भुगत रहा है। इसलिए उसे रिहा किए जाने का आदेश दिया जाता है। उसे जंगीपुर के सेशन कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनायी थी। हाई कोर्ट के जस्टिस राजाशेखर मंथा और जस्टिस शब्बार रसीदी के डिविजन बेंच ने इस बाबत दायर अपील पर सुनवाई के बाद उपरोक्त आदेश दिया।

एडवोकेट घनश्याम पांडे ने यह जानकारी देते हुए बताया कि यह घटना 2011 की है और जंगीपुर के सेशन जज ने अभियुक्त को आईपीसी की धारा 302 के तहत उम्रकैद की सजा सुनायी थी। डिविजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि इस मामले में अभियुक्त को 498ए के तहत सजा दी जानी चाहिए थी। यह सजा अधिकतम दस साल की है। डिविजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि इस मामले में अभियुक्त पीटिशनर का इरादा हत्या करने की नहीं थी। उसने इसके लिए कोई साजिश नहीं रची थी। अगर उसका इरादा पत्नी को मार डालने का होता तो वह उसे जंगीपुर के एसडी अस्पताल नहीं ले जाता। उसके घर वालों को खबर नहीं देता। पत्नी ने मरने से पहले डॉक्टर को दिए गए अपने बयान में कहा था कि उसके पति ने उस पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी थी। शराब पी कर घर आना और जुआ खेलना उसकी रोजाना की आदत में शामिल था। उस दिन भी शराब पी कर घर आया था और जुआ खेलने के लिए पत्नी से झुमका देने की जिद करने लगा। पत्नी के इनकार करने पर आवेश में आकर उसने पत्नी के शरीर पर मिट्टी का तेल छिड़कने के बाद आग लगा दी थी। डिविजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि इसमें कोई शक नहीं कि उसने अपराध किया था। पर सजा धारा 302 के तहत नहीं 498ए के तहत दी जानी थी।

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