

जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : हाई कोर्ट के जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य के डिवीजन बेंच ने एक मामले में अंतरिम आदेश दिया है। इसमें कहा है कि बेटा अपने पिता के साथ ही रहेगा। डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट के उसे आदेश को खारिज कर दिया है जिसमें मां के पढ़ी-लिखी होने का हवाला देते हुए आदेश दिया गया था कि बेटे को मां को सौंप दिया जाए। डिवीजन बेंच ने कहा है कि सिर्फ पढ़ी-लिखी होने भर से ही बेटे पर पिता के मुकाबले मां का दावा अधिक नहीं हो जाता है। ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ पिता ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
डिवीजन बेंच ने इसके पीछे एक तर्क दिया है। बेटा जन्म होने के बाद तीन साल तक अपने माता-पिता के साथ रहा था। माता-पिता में 2021 में अलगाव हो गया और इसके बाद से बेटा अपने पिता के साथ ही रह रहा है। मां के एडवोकेट की दलील थी कि वह पढ़ीलिखी होने के कारण बेटे को बेहतर शिक्षा दे सकती है। डिवीजन बेंच ने कहा है कि ट्रायल जज फैसला सुनाते समय अपने व्यक्तिगत भावनाओं में बह गए थे। प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों के मुताबिक बेटे को अपने पिता के घर में अच्छी शिक्षा मिल रही है। उसकी चाची उसे कोचिंग देती है। इसके अलावा दो प्राइवेट ट्यूटर भी लगाए गए हैं। डिवीजन बेंच ने अंतरिम आदेश देते हुए कहा है कि इस अपील पर सुनवाई होगी। डिवीजन बेंच ने मां को मायूस भी नहीं किया है। आदेश दिया है कि सप्ताह में एक दिन बच्चा मां के पास रहेगा। प्रत्येक शनिवार की शाम को पांच बजे बच्चे को वह उसके पिता की आवास से अपने आवास पर ले आएगी। इस दौरान बच्चा उनके पास रहेगा और रविवार की शाम पांच बजे तक वह बच्चे को वापस पिता के आवास में पहुंचा देगी। बहरहाल माता-पिता के इस टकराव के बीच ट्रायल जज ने बेटे को भी सुना था। बेटा अपने माता-पिता दोनों के साथ रहना चाहता है। बकौल ट्रायल जज बेटे का लगाव मां से ज्यादा है।
बेटा पिता के पास ही रहेगा हाई कोर्ट का आदेश
पढ़ी-लिखी होने भर से नहीं बन जाता है मां का दावा
जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : हाई कोर्ट के जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य के डिवीजन बेंच ने एक मामले में अंतरिम आदेश दिया है। इसमें कहा है कि बेटा अपने पिता के साथ ही रहेगा। डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट के उसे आदेश को खारिज कर दिया है जिसमें मां के पढ़ी-लिखी होने का हवाला देते हुए आदेश दिया गया था कि बेटे को मां को सौंप दिया जाए। डिवीजन बेंच ने कहा है कि सिर्फ पढ़ी-लिखी होने भर से ही बेटे पर पिता के मुकाबले मां का दावा अधिक नहीं हो जाता है। ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ पिता ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
डिवीजन बेंच ने इसके पीछे एक तर्क दिया है। बेटा जन्म होने के बाद तीन साल तक अपने माता-पिता के साथ रहा था। माता-पिता में 2021 में अलगाव हो गया और इसके बाद से बेटा अपने पिता के साथ ही रह रहा है। मां के एडवोकेट की दलील थी कि वह पढ़ीलिखी होने के कारण बेटे को बेहतर शिक्षा दे सकती है। डिवीजन बेंच ने कहा है कि ट्रायल जज फैसला सुनाते समय अपने व्यक्तिगत भावनाओं में बह गए थे। प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों के मुताबिक बेटे को अपने पिता के घर में अच्छी शिक्षा मिल रही है। उसकी चाची उसे कोचिंग देती है। इसके अलावा दो प्राइवेट ट्यूटर भी लगाए गए हैं। डिवीजन बेंच ने अंतरिम आदेश देते हुए कहा है कि इस अपील पर सुनवाई होगी। डिवीजन बेंच ने मां को मायूस भी नहीं किया है। आदेश दिया है कि सप्ताह में एक दिन बच्चा मां के पास रहेगा। प्रत्येक शनिवार की शाम को पांच बजे बच्चे को वह उसके पिता की आवास से अपने आवास पर ले आएगी। इस दौरान बच्चा उनके पास रहेगा और रविवार की शाम पांच बजे तक वह बच्चे को वापस पिता के आवास में पहुंचा देगी। बहरहाल माता-पिता के इस टकराव के बीच ट्रायल जज ने बेटे को भी सुना था। बेटा अपने माता-पिता दोनों के साथ रहना चाहता है। बकौल ट्रायल जज बेटे का लगाव मां से ज्यादा है।