ईश्वर अहंकारी से करते हैं घृणा : गोविंददेव गिरिजी महाराज

अहंकार मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण
Kolkata
गोविंददेव गिरिजी महाराज
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कोलकाता : श्री दाधीच परिषद (कोलकाता) की ओर से गंगासागर धाम में भवन निर्माण प्रकल्प के सहयोगार्थ आयोजित सप्ताहव्यापी श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन राष्ट्रसंत गोविंददेव गिरिजी महाराज ने रासलीला, मथुरा गमन, कंस वध और रुक्मिणी विवाह के प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। गोलाघाटा (वीआईपी रोड) स्थित डीबीनीटी पैवेलियन में आयोजित कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

व्यासपीठ से प्रवचन करते हुए महाराज श्री ने कहा कि श्रीमद्भागवत में महारास के पांच अध्याय विशेष महत्व रखते हैं। इनमें वर्णित पंचगीत भागवत के पंचप्राण हैं। जो भक्त इन गीतों का श्रद्धापूर्वक गायन करता है, उसे भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त होती है।

उन्होंने बताया कि महारास जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। गोपी गीत को विश्व का श्रेष्ठ विरह गीत बताते हुए उन्होंने कहा कि उसके आध्यात्मिक भावों को समझना सहज नहीं है।

कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा प्रस्थान, कंस वध, महर्षि संदीपनी के आश्रम में शिक्षा ग्रहण, कालयवन वध, उद्धव-गोपी संवाद, द्वारका स्थापना और रुक्मिणी विवाह के प्रसंगों का संगीतमय वर्णन किया गया। उद्धव द्वारा गोपियों को गुरु स्वीकार करने का प्रसंग भी विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया।

महाराज श्री ने अहंकार को मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण बताते हुए कहा कि अहंकारी व्यक्ति सच्ची साधना नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि पापी, कामी, क्रोधी और झूठ बोलने वाला व्यक्ति भी अपने दोषों से मुक्त हो सकता है, लेकिन अहंकार से ग्रस्त व्यक्ति का उद्धार कठिन है। अहंकार सभी विकारों का सेनापति है।

कंस का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण से पारिवारिक संबंध होने के बावजूद अहंकार के कारण उसका विनाश हुआ।

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